लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों से संबंधित है। - Page 34

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(1) अपराधी विचारण के लिए उस देश में भेजा जा सकता है जहां अपराध किया

गया था।

(2) अपराधी ब्रिटिश भारत में विचारित किया जा सकता है। प्रथम प्रत्यर्पण की कार्यवाही

कहलाता है। दूसरा क्षेत्रीय अधिकारिता के अनुसार कार्यवाही करना कहा जा सकता

है।

(1) भारत के बाहर प्रत्यर्पण किसी -

(अ) देशी राज्य

(ब) विदेशी राज्य

(स) सम्राट के डोमिनियन में हो सकता है।

(अ) देशी राज्य

देशज राज्य का प्रत्यर्पण भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम, 1903 के द्वारा विनियमित होता है।

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पार्लियामेंट की संविधियों और भारतीय विधानमंडल के अधिनियमों का मान करते हुए मैं निरपेक्ष न्यायालयों के अधिक्षेत्रीय उद्देश्य के लिए इस भूमंडल का भौगोलिक विभाजन निम्नानुसार करता हूंः-

(1) दंड प्रक्रिया संहिता एवं भारतीय साम्राज्य विधानमंडल के अन्य अधिनियमों द्वारा विनियमित देश एवं विदेशों के क्षेत्रीय विभाजन।

(2) संविधियों 41 एवं 42 वी आई सी सी 73 द्वारा विनियमित सीमा क्षेत्रीय सागर।

(3) महासागर, संविधियों 12 एवं 13 विक. सी. 96 (नौ अधिकरण अपराध औपनिवेशिक) 23 एवं 24 विक सी 88 एवं 37 और 38 विक सी 2 द्वारा विनियमित होते हैं। यह इस प्रकार देखा जाएगा कि महासागरों पर अपराध पार्लियामेंट संविधि 12 द्वारा नियंत्रित होते हैं और 13 विक औपनिवेशिक न्यायालयों की सभी अपराधों जो नौ-सेनाध्यक्ष द्वारा अन्वीक्षित हुए हैं, को अन्वीक्षित किया जाना निर्धारित करती है। धारा 23 एवं 24 विक सी 88 संविधि 12 एवं 13 विक सी 96 को भारत में प्रयुक्तनीय बनाता है और संविधि 37 एवं 88 विक. सी. 27 अपराध को भारतीय विधि के अनुसार दंडनीय बनाता है।

19 बम्बई एल.आर. 527

भारत, 1897 के साधारण अधिनियम की धारा 8 के खंड 3(27) में इस प्रकार परिभाषित है -

भारत के वायसराय के द्वारा महामहिम के महाधिपत्य के अधीन किसी देशी राजा