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भविष्य में अर्जित किए जाने वाले अधिकारों का समनुदेशन
- अब तक हम उन अधिकारों के संबंध में विचार कर चुके हैं जो उस समय उद्भूत
हुए थे जब समनुदेशन हुआ था।
- अब हमें भविष्य में अर्जित होने वाले अधिकारों के समनुदेशन पर विचार करना
चाहिए।
- ऐसे अधिकारों के उदाहरणः-
(i) संपदा को उत्तराधिकार में प्राप्त करने की विधि अनुकूल वारिस की प्रत्याशा।
(ii) पर्सनेलिटी को उत्तराधिकार में पाने की एक निकट संबंधी की प्रत्याशा।
(iii) अभी तक उपार्जित न किया गया भाड़ा।
(iv) भावी बही ऋण।
- सामान्य विधि में वे सभी शून्य थे। कोई व्यक्ति जो उसके पास नहीं है उसे
समनुदिष्ट नहीं कर सकता था। साम्या में वे समनुदेशनीय थे यदि मूल्यवान हों। 5. साम्या उन्हें समनुदेशन नहीं मानती वरन् समनुदेशन संविदा मानती थी और जब
समनुदेशिती उस पर काबिज हो जाता तो वह अपनी संविदा का पालन करने को
बाध्य किया जाता था।
- जब समनुदेशक द्वारा अधिकार अर्जित कर लिया जाता था तो फायदा हित तुरंत
समनुदेशिती को मिल जाता था, परन्तु विधिक हित समनुदेशक के पास ही रह
जाता था। ताकि यदि समनुदेशक उसे पश्चात्वर्ती समनुदेशिती जिसने मूल्य दिया
था और जिसके पूर्ववर्ती समनुदेशन की सूचना नहीं थी को अंतरित करता तो
पश्चात्वर्ती समनुदेशिती का अभिभावी रहेगा।
संपरिवर्तन
1. संपरिवर्तन के सिद्धांत की आवश्यकता
- आंग्ल विधि ने स्वामी को रियलिटी (निजी संपत्ति) एवं पर्सनेलिटी (भूसंपत्ति) के
न्यायगमन के लिए भिन्न तरीका विदित किया था, यदि वह बिना वसीयत किए
मर जाता था। उसकी स्थाई संपत्ति उसके वारिस को जाती थी और निजी संपत्ति
उसके निकट संबंधी को जाती थी।
- ऐसा होते हुए संपत्ति वारिस को मिलेगी या निकट संबंधी को यह उस दिनांक को
जिसको उत्तराधिकार प्रारंभ होता है संपत्ति की स्थिति पर निर्भर होनी चाहिए। 3. सामान्यतः कोई कठिनाई नहीं है। वह वास्तविक स्थिति, जिसमें संपत्ति तात्विक