338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
होगी, उसके न्यागमन का निर्धारण करेगी। किंतु मान लो, परिस्थितियां ऐसी हैं कि
वह दिनांक जिसको उत्तराधिकार प्रारंभ होता है, भूमि का धन के लिए विक्रय होना
था किंतु वह बेची नहीं जाती है, या भूमि के क्रय हेतु धन का निवेश किया जाना
था किंतु किया नहीं जाता है, तो उस संपत्ति का न्यायगमन किस प्रकार निर्धारित
किया जाना चाहिए? यदि भूमि जब तक वस्तुतः बेची नहीं जाती है, भूसंपत्ति ही
मानी जाती है तो वह वारिस को प्राप्त होगी। दूसरी ओर यदि वह धन के रूप में
मानी जाती है तो क्योंकि उसे धन के लिए बेचने का इरादा किया था, तब यद्यपि
वह भूमि ही है तो भी वह निकट संबंधी को दी जाएगी। दूसरे शब्दों में प्रश्न यह
था क्या संपत्ति का न्यायगमन वास्तविक स्थिति के अनुसार होना था जिसमें वह
अस्तित्वशील पाई जाती है। या उस रूप के अनुसार जिसमें इसको संपरिवर्तित
किए जाने का इरादा किया था। साम्या में इसका उत्तर था कि न्यायगमन संपत्ति की
स्थिति, जिसमें वह अस्तित्वशील थी के अनुसार नहीं वरन् उस रूप के अनुसार
होगा जिसमें उसे परिवर्तित करने का इरादा किया था।
- यही परिवर्तन का सिद्धांत कहलाता है। इस सिद्धांत की आवश्यकता नहीं पड़ती
यदि स्थावर संपत्ति एवं निजी संपत्ति के विरासत के नियमों में भिन्नता न होती।
यह अंतर अब धारा 33, 45 के अनुसार निरस्त कर दिया गया - अतः संपरिवर्तन
ने अपने समग्र महत्त्व को खो दिया है।
- भारत में संपत्ति की विरासत में ऐसा कोई अंतर नहीं है - स्थावर संपत्ति वारिस
को और निजी संपत्ति निकट संबंधी को।
II. निम्न चार मामलों में संपरिवर्तन उद्भूत होता है -
(1) विधि के प्रवर्तन द्वारा।
(2) न्यायालय के आदेश के प्रवर्तन द्वारा।
(3) संविदा की प्रवर्तन द्वारा।
(4) विलेख या विल में निदेश के प्रवर्तन द्वारा।
1. विधि के प्रवर्तन द्वारा संपरिवर्तन
- ऐसा केवल एक मामला है जिसमें संपरिवर्तन विधि के प्रवर्तन द्वारा संपन्न होता है। वह मामला भागीदारों का मामला है। भागीदारी अधिनियम 1890 की धारा 39 के अनुसार हर एक भागीदार को अपेक्षा करने का अधिकार है कि भागीदारी से संबंधित संपत्ति बेची जाएगी, और उसकी आय सभी ऋण एवं दायित्वों के उन्मोचन के बाद सभी भागीदारों में उनके पूंजी में अंश के अनुसार वितरित की जाएगी। फलतः भू संपत्ति जो भागीदारों की संपत्ति है, पर्सनेलिटी मानी जाती है, न कि रियलिटी के रूप में।