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हो और अपराध ऐसा हो जो भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम की प्रथम अनुसूची में वर्णित हो।
धारा 10
ब्रिटिश भारत में मजिस्ट्रेट अपनी प्रेरणा से बिना किसी अधियाचन की संतोषप्रद सूचना या परिवाद पर गिरफतारी के वारंट जारी कर सकते हैं और अपराधी को उस राज्य जिसके अधिक्षेत्र में उसने अपराध किया था, को समर्पित कर सकते हैं।
ध्यान दीजिए - यह अधिनियम अधकिरों एवं उनके द्वारा संरक्षित प्रत्यर्पण के विशेष प्रावधानों के अधीन है।
प्रत्यर्पण, प्रत्यर्पण अधिनियम द्वारा नियमित होता है।
(ब) विदेशी राज्य - अपराध का परिदृश्य।
विदेशी राज्य की स्थिति में जहाँ इंग्लिश प्रत्यर्पण लागू होता है, अपराधी अधियाचन पर ऐसे विदेशी राज्य को समर्पित किया जा सकता है।
परन्तु
(i) भारत की सरकार या स्थानीय सरकार उपयुक्त समझती है,
(ii) यदि अपराध भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम की प्रथम अनुसूची में वर्णित में से एक है।
(iii) यदि अपराध राजनैतिक प्रकृति का नहीं है।
(स) अधिराज्य - अपराध का परिदृश्य।
प्रत्यर्पण निम्न से आंशिक रूप में शासित होता है -
(i) प्रपलायी अपराधियों का अधिनियम (संसदीय संविधि) एवं और भागतः
(ii) भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम द्वारा।
समग्र आपराधिक अधिक्षेत्र स्थानीय हैः अपराध का अधिक्षेत्र उस देश से संबंधित होता है जहां अपराध किया गया था।
एल.आर. (1918) ए सी 458
अपराध विशुद्धतः स्थानीय है। अर्थात् उस स्थान की विधि पर निर्भर करता है जिसमें वह किया जाता है। उस अपराधी व्यक्ति की राष्ट्रीयता पर नहीं।
एल.आर. (1894) ए.सी. 670
ब्रिटिश भारतीय न्यायालयों का ब्रिटिश राज्य क्षेत्र के बाहर किए गए एवं पूर्ण हुए अपराधों के लिए एक विदेशी का विचारण करने की अधिकारिता नहीं। कोई भी विदेश्ी प्रजाजन ब्रिटिश भारत के बाहर किए गए अपराध के लिए ब्रिटिश भारत में विचारित नहीं किया जा सकता है।
28 अल 372ः 2 बम्बई एल.आर. 337
जहां देशी राज्य के प्रजाजन ने उस राज्य में चोरी की और बाद में वह ब्रिटिश भारत