सामान्य विधि - Page 361

344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

या विल प्रवर्तन में आएगा, उस समय या उससे पूर्व होती है जिस पर संपरिवर्तन करने का कर्त्तव्य उद्भूत होना है, कोई संपरिवर्तन घटित नहीं होगा और संपत्ति जैसी थी वैसी ही रहेगी। कारण है कि कोई व्यक्ति नहीं है जो संपरिवर्तित होने वाली संपत्ति के स्वरूप के बदले जाने का आग्रह कर सके।

  1. असफलता पूर्ववर्ती हो, पश्चात्वर्ती नहीं।

  2. पूर्ण असफलता के मामले में संपरिवर्तन से संबंधित नियम एकसमान हैं और विलेख में निदेश एवं बिल में निदेश के प्रभावों में कोई अंतर नहीं है।

(ii) आंशिक असफलता के वाद

  1. जहां प्रयोजन केवल अंशतः असफल हो चुके हैं वहां ऐसे प्रयोजन असफल नहीं हुए हैं, निष्पादित करने के लिए संपरिवर्तन आवश्यक है। फलतः संपरिवर्तन का सिद्धांत प्रवर्तित होगा और वह प्रतिनिधि संपत्ति को उस रूप में वह जिसमें संपरिवर्तित होने को निदेशित की गई है, लेने के लिए हकदार होगा।

  2. वह आवश्यक सीमा तक निष्पादित किया जाएगा।

दृष्टांतः अ रियलिटी संपत्ति को बेचने और विक्रय आगम को ब एवं स में वितरित करने के लिए न्यासियों को विश्वास पर वसीयत में देता है। ब पहले मर जाता है, अ एवं स उसके बाद भी जीवित रहते हैं। यहां विक्रय इसलिए आवश्यक हैं कि जो अ उसको देने का आशय रखता है स उसे अर्थात् धन पा सकता है। स अपने अंश का धन लेगा।

ब के अंश क्या होगा?

वह वस्तुतः धन है और निश्चित ही निकट संबंधी को जाना चाहिए। किंतु वारिस को जाएगा क्योंकि उस सीमा तक संपरिवर्तन आवश्यक था। वारिस उसे लेता है परंतु धन के रूप में ही।

दृष्टांतः-

अ पर्सनेलिटी संपत्ति को वसीयत करके ब एवं स के लिए भूमि क्रय में निवेश करने के लिए न्यासियों को देता है। ब पहले मर जाता है और अ तथा स बाद में जीवित रहते हैं यहां क्रय आवश्यक है क्योंकि जो अ, स को देना चाहता है अर्थात् भूमि स उसे ले सकता है। स भूमि में अपने अंश को लेगा।

ब के अंश का क्या होगा? वह निकट संबंधी को जाएगा क्योंकि उस सीमा तक संपरिवर्तन अनावश्यक है। किंतु निकट संबंधी उसे भूमि के रूप में ही लेगा।

प्रतिसंपरिवर्तन

  1. प्रतिसंपरिवर्तन का अभिप्राय है, पूर्ववर्ती संपरिवर्तन का निष्प्रभावीकरण या