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धारा 28 अपराध-स्वीकरण के बाद ........... दूर किया जाता है
धारा 29
शंकाएं -
- क्या धारा 24 सुनवाई करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 387 के अंतर्गत अभियुक्त द्वारा किए गए अभिकथन पर प्रयुक्त होती है।
प्रश्न, असमाधानित।
17 बंबई, एल.आर. 1059
II. क्या धारा 24 भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 339(2) के अंतर्गत क्षमाधीन एक इकबालिया गवाह के अभिकथन पर प्रयुक्त होती है।
(22 बंबई एल.आर. 1247)
अपराध-स्वीकरणों का उपयोग
- एक अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किया गया अभिकथन मात्र इस प्रकार उसको आबद्ध करता है, क्योंकि इसके दो कारण हैं।
(i) विधि का सामान्य नियम है कि एक व्यक्ति द्वारा किया गया कथन पूर्वाग्रहपूर्वक एक दूसरे व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
(ii) एक अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किया गया अभिकथन शपथ नहीं है।
(iii) अभिकथन प्रतिपरीक्षण के अधीन नहीं है।
किंतु यदि अभिकथन एक अपराध-स्वीकरण है जो दोनों स्वयं को और एक अन्य व्यक्ति को प्रभावित करता है, तब धारा 30 व्यक्त करती है कि न्यायालय अभियुक्त द्वारा किए गए अपराध स्वीकरण को अपराध-स्वीकरण में आरोपित अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध विचार करने में ले सकता है।
अतः धारा 30, सामान्य नियम का एक अपवाद है। इस अपवाद का कारण है, स्वालिप्तन का तथ्य जो कुछ-कुछ अन्य व्यक्ति के विरुद्ध अभियोजन के सत्य के लिए वही प्रत्याभूतित करना माना जाता है।
एक अन्य अभियुक्त के विरुद्ध एक अभियुक्त के अपराध-स्वीकरण के संबंध में महत्त्वपूर्ण शब्द फ्न्यायालय विचारण में ले सकता हैय् है। इसका अभिप्राय है
(1) कि उपयोग आवश्यक नहीं है। वह अनुज्ञात्मक और विभेदमूलक है। न्यायालय उसे उपयोग करने को अनुज्ञात है। न्यायालय उसका प्रयोग करने को बाध्य नहीं है।
(2) न्यायालय उस पर विचार कर सकता है। शब्द विचार करना महत्त्वपूर्ण है।