350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- एक साक्षी द्वारा किया गया एक अभिकथन, उस शब्द की परिभाषा के अनुसार फ्साक्ष्यय् है। एक अभियुक्त द्वारा स्वयं उसको और उसके सहअभियुक्त को प्रभावित करने वाला एक अपराध स्वीकरण, उस विशेष अर्थ में फ्साक्ष्यय् नहीं है। वह इस अर्थ में है कि वह न्यायालय के समक्ष एक मामला है जिसे वह विचारित कर सकता है। प्रश्न है जबकि उसे इस प्रकार विचारित होने के लिए अनुमत करते हुए क्या वह अन्य साक्ष्य की आवश्यकता को समाप्त कर देता है? इसका साक्ष्य अधिनियम में कोई प्रत्यक्ष उत्तर नहीं दिया गया है। किंतु सभी न्यायालयों ने निर्णीत किया हुआ है कि वह अन्य साक्ष्य का उन्मूलन नहीं करता है। इसके कारण हैं।
(1) अपराध स्वीकरण अन्य व्यक्तियों, जिनको वह शामिल करता है, के विरुद्ध उसके सत्य की एक परिपूर्ण प्रत्याभूति कभी नहीं होती। एक अपराध स्वीकरण जहां तक वह उसके कर्ता को आलिप्त करता है सत्य हो सकता है, किंतु जहां तक वह दूसरों की दुर्भावना और बदले की भावना द्वारा प्रभावित करता है, असत्य और कूटरचित हो सकता है।
(2) अपराध-स्वीकरण एक सहअपराधी के साक्ष्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि बाद का प्रतिपरीक्षण के अधीन है, जबकि पूर्ववर्ती नहीं है। और यदि एक सह-अपराधी का साक्ष्य पुष्टिकरण की अपेक्षा करता है, एक अपराध-स्वीकरण होना ही चाहिए।
निष्कर्षः-
यदि यह हैः-
(अ) वाद में कोई अन्य साक्ष्य पूर्ण नहीं है, या
(ब) अन्य साक्ष्य आग्राह्य है,
ऐसा एक अपराध-स्वीकरण अकेला, दोषसिद्धि को संपोषित नहीं करेगा। यहां पुष्टिकरण होना ही चाहिए।
जब कई व्यक्ति एक ही कार्य से उद्भूत होने वाली एक ही परिभाषा के अंतर्गत एक अपराध के अभियुक्त हैं, तो एक के अपराध-स्वीकरण का दूसरे के विरुद्ध उपयोग किया जा सकता है, यद्यपि इसलिए उस सह-अपराधी में से एक पृथक अपराध संघटित करने में सक्षम और अपने सह-अपराधी पर उन आरोपियों से पृथक्करणीय कार्यों द्वारा उसे स्वयं हृदयंगम करता है।
8 बंबई 223ः 7 मद्रास 579
उपशमन - अपराध
- शब्दों के निर्माण और प्रमाणित होने का महत्त्व। क्या धारा अन्वीक्षण करने पर एक अभियुक्त द्वारा किए गए अभिकथन जो स्वयं उसको अभिशस्त करता है और