352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
जब तक एक अभियुक्त जो अपराध स्वीकार कर चुका है दोषसिद्ध या उन्मुक्त नहीं किया जाता है, तब तक वह एक अभियुक्त व्यक्ति है और इसलिए सह-अभियुक्त के विरुद्ध साक्षी नहीं है।
13 सी.डब्ल्यू.एन. 55
जब तक एक अभियुक्त व्यक्ति जो अपराध स्वीकार कर चुका है, दोषसिद्ध और दंडादेशित नहीं हो जाता तब तक वह एक अभियुक्त व्यक्ति है और इसलिए, सह अभियुक्त के विरुद्ध एक सक्षम साक्षी नहीं है।
3 बंबई एल.आर.
सारांश
जब एक व्यक्ति अपराध स्वीकार करता है - संयुक्त रूप से अन्वीक्षित होने से पर्यवसित हो जाता है किंतु वह अभियुक्त व्यक्ति होने से पर्यवसित नहीं होता। इसलिए अपराधों के तर्क पर उसका अपराध-स्वीकरण अन्य सह-अभियुक्त के विरूद्ध विचाराधीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे संयुक्त रूप से अ अन्वीक्षित सह-अभियुक्त नहीं है, न ही वह एक साक्षी के रूप में बुलाया जा सकता है क्योंकि जब तक वह दंडादेशित नहीं होता है वह निरंतर एक अभियुक्त बना हुआ है।
जब एक व्यक्ति अपराध स्वीकार करता है और वह संयुक्त रूप से अन्वीक्षित किया जाता है और अभियुक्त व्यक्ति होने से अलग हो जाता है उसका अपराध-स्वीकरण उपयोग नहीं किया जा सकता किंतु वह एक सक्षम साक्षी हो जाता है।
निर्णयों की सुसंगतता
धारा 40
जहां प्रश्न है क्या एक न्यायालय को एक मामले में संज्ञान लेना या ऐसा अन्वीक्षण नियंत्रित करना चाहिए।
एक निर्णयादेश या डिक्री का अस्तित्व जो किसी न्यायालय को ए मामले का संज्ञान लेने या अन्वीक्षण करने से निरोधित करता है सुसंगत तथ्य है।
टीका
विधि, जिसके द्वारा एक पूर्ववर्ती निर्णयादेश या डिक्री एक सिविल न्यायालय को एक वाद का संज्ञान लेने से निरोधित करती है सिविल प्रक्रिया संहिता में अंर्त्विष्ट है और विधि, जिसके द्वारा एक पूर्ववर्ती निर्णय एक खंड न्यायालय को अन्वीक्षण करने से निरोधित करता है, खंड प्रक्रिया संहिता में अंतर्विष्ट है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की सुसंगत धारा 11-14 हैं। व्यवस्थाएं संक्षिप्त है फ्फील्डय् में पृष्ठ 260 पर।