357
अपवाद जो प्रलेख के निबंधनों को परिवर्तित करने के लिए मौखिक साक्ष्य
का दिया जाना अनुज्ञात करते हैं।
वे धारा 92 में अंतर्विष्ट हैं और उनके अंतर्गत निम्नलिखित मामले आते हैं।
ध्यान देने की प्रथम बात है कि ऐसा साक्ष्य दिया जा सकता है। उन व्यक्तियों द्वारा, जो प्रलेख के प्रति पक्षकार नहीं थे या जो प्रलेख के पक्षकारों के हित के प्रतिनिधि नहीं थे।
मामले जिनमें प्रलेख के पक्षकार या उनके हित के प्रतिनिधि मौखिक साक्ष्य दे सकते हैं, निम्नानुसार हैंः-
(i) तथ्य जो एक प्रलेख को अमान्य करेंगे, जैसे कपट, क्षमता का अभाव।
(ii) तथ्य जिन पर प्रलेख मौन है और जो उसके निबंधनों के साथ असंगत हैं।
(iii) पूर्ववर्ती प्रतिबंध।
(iv) मौखिक करार।
(v) प्रथा या रूढि़ जिनके द्वारा प्रसंगतियां संविदाओं से संलग्न की जाती हैं (बेकर्स
डॉजन) परन्तु वह असंगत नहीं हैं।
(vi) तथ्य दर्शाते हुए कि भाषा तथ्यों से किस प्रकार संबंधित है।
मामले जहां प्रलेख्य साक्ष्य का स्पष्टकीरण करने हेतु मौखिक साक्ष्य ग्रहण किए जा सकेंगे।
विधि की दो प्रस्थापनाएं हैं जो प्रलेख्य साक्ष्य से संबंधित सर्वोत्तम साक्ष्य के प्रथम नियम से उद्भूत होती हैं।
- जहां एक प्रलेख में सम्मिलित कार्यवाही एक अव्ययनात्मक प्रकृति की है या
जिसका लिखित में होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है, उस कार्यवाही का तथ्य
मौखिक साक्ष्य द्वारा प्रमाणित किया जा सकेगा।
- जहां वह व्ययनात्मक या विधि द्वारा लिखित होना अपेक्षित है तब कार्यवाही को
प्रमाणित करने के लिए न केवल मौखिक साक्ष्य दिया जा सकता है वरन् प्रलेख
में सम्मिलित कार्यवाही के अनुबंधों का खंडन परिवर्तन या संशोधन करने के लिए
भी साक्ष्य नहीं दिया जा सकता है।
- तो भी एक प्रश्न बाकी रहता है। क्या प्रलेख्य साक्ष्य का स्पष्टीकरण करने के
लिए मौखिक साक्ष्य दिया जा सकता है? यह एक प्रभिन्न प्रश्न है और उस प्रश्न
से पृथक किया जाना चाहिए कि क्या प्रलेख्य साक्ष्य के अनुबंधों/संविदा आदि को
परिवर्तित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकता है।