358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- यह प्रश्न 93-100 तक की धाराओं में व्यवहारित किया गया है।
- प्रलेख्य साक्ष्य के व्यवहार में तीन अभियोगी विषयों पर विवाद उद्भूत हो
सकेगा।
(i) वर्तमान तथ्य के प्रलेख की भाषा की प्रयुक्ति या अप्रयुक्ति के संबंध में विवाद।
(ii) प्रलेख के अर्थ के संबंध में विवाद जहां उसमें उपयोग की गई भाषा संदिग्ध
या सदोष है।
(iii) प्रलेख में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ के संबंध में विवाद।
- प्रथम के अंतर्गत विवाद के तीन संभव मामले हैं -
(1) जहां भाषा तथ्यों के लिए यथार्थतः प्रयुक्त की जाती है और प्रतिवाद यह है कि वह प्रयुक्त करने के अर्थ में नहीं थी - प्रतिवाद के समर्थन में साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा यह जाहिर करने के लिए कि वह वर्तमान तथ्यों के लिए प्रयोग करने के तात्पर्य से नहीं थी जिसके लिए वे प्रयुक्त होते ही हैं। - धारा 94
(2) जहां भाषा वर्तमान तथ्यों में से एक पर प्रयुक्त होती है किंतु उन सबके लिए नहीं - और प्रतिवाद है कि वह एक विशिष्ट तथ्य के प्रति प्रयुक्त होती है - प्रतिवाद के समर्थन में साक्ष्य दिया जा सकेगा, यह बताने के लिए कि किस विशेष तथ्य के प्रति उसका प्रयोग किया जाना अभिच्छित था।
(3) जहां भाषा अंशतः तथ्यों के एक संवर्ग पर प्रयोग होती है और अंशतः एक दूसरे तथ्यों के संवर्ग पर और प्रतिवाद है कि वह एक संवर्ग पर प्रयुक्त होती है एवं दूसरे पर नहीं। प्रतिवाद के समर्थन में साक्ष्य दिया जा सकेगा यह बताने कि दोनों में से जिस पर वह प्रयुक्त होने को थी। - धारा 97
- विवादों के दूसरे शीर्षक के अंतर्गत दो संभव मामले हैंः
(i) जहां भाषा संदिग्ध या सदोष है और प्रतिवाद है कि पक्षकारों का एक विशेष बात से अभिप्राय है - प्रतिवाद के समर्थन में उसके तात्पर्य को दर्शित करने या उसके दोषों को प्रस्तुत करने हेतु साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा। - धारा 93
(ii) जहां भाषा स्वतः सरल है किंतु विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में निरर्थक है और प्रतिवाद है कि वह एक विशेष बात को इंगित करने हेतु अभिप्रेत थी - प्रतिवाद के समर्थन में जिससे संबंधित थी, को दर्शाने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा। - धारा 95
- विवादों के तीसरे शीर्षक के अंतर्गत निम्नलिखित मामला खड़ा होता है।
(i) ................... (पांडुलिपि में स्थान खाली छोड़ा गया है - संपादक)