सामान्य विधि - Page 378

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(ब) मामले जो पक्षकारों द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।

(स) मामले जिनके अस्तित्व को विधि द्वारा अनुमानित किया जाता है।

मामले जो न्यायिकतः जाने जाते हैं

  1. धारा 56 और 57 उन तथ्यों के साथ व्यवहार करती हैं जो न्यायिकतः जाने जाते हैं। धारा 57 तेरह मामलों का गणन करती है जिन पर न्यायिक ध्यान देना चाहिए।

धारा 56 कहती है कि कोई तथ्य जिस पर न्यायालय न्यायिक ध्यान देगा को साक्ष्य द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। पक्षकार एक तथ्य जो, धारा 57 के अंतर्गत जिस पर न्यायिक ध्यान देना चाहिए के अंतर्गत आने वाले मामलों में से किसी एक के अंतर्गत आती है, को प्रमाणित करने हेतु कोई साक्ष्य प्रस्तुत करने के भार से मुक्त किए जाते हैं।

  1. धाराओं के मूल में सिद्धांतः- कुछ मामले इतने विख्यात हैं और इतने स्पष्टतः प्रस्थापित हैं कि यह आग्रह करना व्यर्थ होगा कि वे साक्ष्य द्वारा प्रमाणित किए जाने चाहिए।

दृष्टांतः-

  1. शत्रुता का आरंभ और निरंतरता।

  2. देश के भौगोलिक विभाजन।

ये तथ्य इतने विख्यात हैं कि साक्ष्य द्वारा उनका प्रमाण अनावश्यक है।

  1. धारा 57 में आगणित मामले।

(i) विधि का बल रखने वाले नियम

बहुत से अधिनियम स्थानीय अधिशासन को इस अधिनियम के अनुबंधों को प्रभावी रूप में क्रियान्वित करने का नियम बनाने और घोषित करने कि ऐसे नियम विधि की शक्ति रखेंगे, की शक्ति देने वाली एक धारा अंतर्विष्ट करते हैं। अर्थात् भारतीय शासन अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम ऐसे नियम इस धारा के क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

  1. नियम, विधि और रूढि़ जो विधि के स्रोत हैं की शक्ति रखने वालों के बीच एक प्रभेद अवश्य करना चाहिए। हिंदू विधि का बड़ा भाग रूढि़ पर आधारित है। किंतु न्यायालय एक रूढि़ को कानूनी रूप से नहीं देखेगा। पक्षकार जो रूढि़ पर निर्भर है उन्हें रूढि़ के अस्तित्व को अवश्य प्रमाणित करना चाहिए। जब पक्षकार ने रूढि़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है तो न्यायालय इस पर सोच-विचार करेगा, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वह एक वैध रूढि़ है।

  2. यह सत्य है कि कुछ रूढि़यां हैं जिनके प्रमाण के लिए न्यायालय साक्ष्य की