362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
अपेक्षा नहीं करता है। किंतु वह इस कारण नहीं कि न्यायालय उस पर कानूनी रूप से सोच-विचार करने को बाध्य है। न्यायालय औपचारिक प्रमाण की अपेक्षा नहीं करता क्योंकि पूर्व निर्णय के नियम से न्यायालय एक रूढि़ का समर्थन करने को बाध्य है, जिसकी विद्यमानता एवं वैधता एक न्यायालय जिसके वह अधीन है के द्वारा एक पूर्व निर्णय में मान्यता प्रदान की जा चुकी है।
(ii) परिनियम
संसद के द्वारा पारित संविधियां या तो सामान्य होती हैं या विशेष। एक सामान्य संविधि अपनी प्रयुक्ति में सार्वभौमिक है और सभी व्यक्तियों और राज्यक्षेत्रों तक विस्तृत है।
एक विशेष संविधि या तो स्थानीय या वैयक्तिक और विशेष व्यक्तियों और वैयक्तिक संबंधों पर कार्यशील होती है।
संसद के सभी अधिनियम सार्वजनिक समझे जाते हैं जब तक कि उनको प्रतिकूल घोषित नहीं किया जाता है - धारा 13, 14 विक्टो. सी. 21
सभी सार्वजनिक अधिनियमों को न्यायिक रूप से अवश्य देखना चाहिए। न्यायालय एक वैयक्तिक अधिनियम की न्यायिक जानकारी लेने को बाध्य नहीं है जब तक कि विशेष निजी अधिनियम उसमें न हो। यदि उसमें ऐसा निर्देशन नहीं है, तो पक्षकार को सिद्ध करना चाहिए कि निजी अधिनियम जिस पर विश्वास किया जा रहा है संसद का अधिनियम है।
(iii) युद्ध के भारतीय अनुच्छेद
यह महामहिम की भारतीय सेना में स्थानीय अधिकारी सैनिकों और अन्य व्यक्ति के लिए अनुशासन के नियम हैं। वे 1911 के भारतीय सेना अधिनियम में समाहित हैं।
1. संसद और परिषद की कार्यवाहियों का क्रम।
कार्यवाहियों का क्रम, स्वतः कार्यवाहियों से प्रारंभ किया जाना चाहिए।
न्यायालय कार्यवाही के क्रम की न्यायिक अधिसूचना लेगा और कार्यवाही की नहीं।
विदेशी राज्य
न्यायालय इस बात की न्यायिक अधिसूचना लेगा कि एक विदेशी राज्य महामहिम द्वारा या वायसराय की परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त है या नहीं।
युद्ध स्थिति
विदेशी राज्यों के बीच युद्ध स्थिति की विद्यमानता की न्यायिक अधिसूचना नहीं ली जाएगी।