374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
है और मुख्य रूप से परीक्षित हो जाता है, तब प्रश्न जो उठता है वह यह हैः-
क्या प्रतिपरीक्षण और पुनप।रीक्षण एक अधिकार या एक विशेषाधिकार का विषय है, जो न्यायालय के विवेकानुसार प्रदान या धारण किया जा सकता है।
इस प्रश्न का उत्तर है कि प्रतिपरीक्षण और पुनप।रीक्षण विशेषाधिकार के नहीं, अधिकार के विषय हैं। न्यायालय एक पक्षकार को साक्षी, जिसका पक्षकार द्वारा मुख्य परीक्षण हो चुका है, का प्रतिपरीक्षण या पुनप।रीक्षण करने से रोक नहीं सकता है। एक साक्षी जो न्यायालय द्वारा बुलाया गया है कार्यवाही के किसी पक्षकार द्वारा नहीं, के बारे में क्या हो? क्या ऐसे साक्षी का प्रतिपरीक्षण करने का कोई अधिकार है? यदि ऐसा है तो किस पक्ष का? साक्ष्य अधिनियम में ऐसे एक वाद के लिए कोई प्रावधान नहीं है। तो भी यह निर्धारित किया गया है कि न्यायालय द्वारा आहूत और परीक्षित एक साक्षी का अधिकृत रूप से न्यायाधीश की अनुज्ञा के बिना प्रतिपरीक्षण दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा नहीं किया जा सकता है।
(1894) 2 क्यू.बी. 316
3 बी.एल.आर. 145
II डब्ल्यू.आर. 110
24 कलकत्ता 288
5 कलकत्ता 614
16 डब्ल्यू.आर. 257
- कब प्रतिपरीक्षण के अधिकार को निष्पादित किया जा सकता है? इस संबंध में सिविल मामलों और दंड मामलों में एक अंतर है।
(i) सिविल मामलों में यह अधिकार तुरंत निष्पादित किया जाना चाहिए। वह किसी आने वाले दिनांक के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता है।
(ii) दंड-मामलों में, दंडाधिकारी के समक्ष एक मामले में और सत्र न्यायालय के मामले में वह अधिकार तुरंत निष्पादित किया जाना चाहिए। किंतु एक अधिपत्र मामले में अभियुक्त को अभियोजन-साक्षी के प्रतिपरीक्षण के आगे की सुनवाई के दिनांक तक स्थगित करने का अधिकार है।
एक व्यक्ति, जो दोनों पक्षकारों द्वारा साक्षी के रूप में बुलाया जाता हैः का मामला अ और ब के बीच एक मामले में, स एक साक्षी के रूप में दोनों अ और ब द्वारा तलब किया जाता है। प्रथम, वह अ द्वारा उसके पक्ष में साक्षी के रूप में बुलाया जाता है। उसके बाद प्रतिपरीक्षण ब द्वारा और अ द्वारा पुनःपरीक्षण के लिए, वह ब द्वारा उसके अपने पक्ष में साक्षी के रूप में बुलाया जाता है।