सामान्य विधि - Page 394

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यह केवल तब होता है जब अपने मुख्य परीक्षण में साक्षी ने दिया है कि यह प्रश्न उद्भूत हो सकता है। प्रश्न साक्षी के साक्ष्य पर प्रतिपरीक्षण या पुनर्परीक्षण की चूक के प्रभाव तक विचार करने के लिए सिमट जाता है।

(2) ऐसी चूक तब घटित होती है जब साक्षी उसके मुख्य परीक्षण के बाद या प्रतिपरीक्षण से पहले, मर जाता है या बीमार पड़ जाता है, पागल हो जाता है या अपंग या गायब हो जाता है।

(3) साक्ष्य अधिनियम स्पष्ट शब्दों में व्यक्त नहीं करता है कि प्रत्यक्ष निबंधनों में इसका क्या प्रभाव होगा। क्या एक साक्षी के प्रतिपरीक्षण या पुनर्परीक्षण के अभाव में, उसका मुख्य परीक्षण में दिया गया साक्ष्य शब्द के विधिक अर्थ में साक्ष्य नहीं रहेगा, और निरस्त कर दिया जाएगा या कि क्या वह अपनी साक्षीय उपयोगिता का प्रभाव मात्र डालेगा, साक्ष्य अधिनियम में व्यक्त नहीं है। यह प्रश्न न्यायिक व्याख्या द्वारा निर्धारित किया जाता है।

न्यायिक व्याख्या के अनुसार दो प्रस्थापनाएं सुस्थापित हैंः

(1) इस प्रकार की चूक से साक्ष्य अग्राह्य नहीं हो जाता। यह मात्र उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित करती है।

(2) अर्थात् वह अविश्वसनीय या विश्वसनीय होगी, यह प्रतिपरीक्षण में चूक के कारणों पर निर्भर करना चाहिए।

दो युक्तियां हैं जिससे प्रतिपरीक्षण में चूक घटती हैः

(i) जहां एक पक्षकार प्रतिपरीक्षण कर सकता था किंतु वह ऐसा नहीं करता है।

(ii) जहां एक पक्षकार प्रतिपरीक्षण कर सकता था किंतु वह ऐसा नहीं कर सका।

विश्वसनीयता का प्रश्न केवल दूसरे मामले में उठ सकता था। वह प्रथम में उद्भूत नहीं हो सकता। विधि एक मौका प्रदान कर सकती है और इससे अधिक कुछ नहीं। यदि मौके का प्रयोग नहीं किया गया तो विधि धारित करती है कि कोई हानि नहीं है।

परीक्षण का विनियमित अनुक्रम

  1. एक साक्षी के परीक्षण का अनुक्रम नियमित रूप से होना ही चाहिए।

  2. परीक्षण का अनुक्रम नियमित होने के लिए उसे साक्ष्य अधिनियम में निर्धारित नियमों के अनुसार होना चाहिए?

  3. परीक्षण के नियमित अनुक्रम के नियम निम्न से संबंधित हैंः

(i) परीक्षण के क्षेत्र से।

(ii) परीक्षण के ढंग से।