सामान्य विधि - Page 396

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नहीं है कि पक्षकार सभी सुसंगत विषयों पर साक्षी का परीक्षण करने के लिए अधिकृत है, नियम है कि साक्षी का परीक्षण सुसंगत तथ्यों तक ही सीमित रहना चाहिए।

यह नियम न केवल मुख्य परीक्षण पर वरन् प्रतिपरीक्षण पर भी लागू होता है। अंतर केवल यह है कि प्रतिपरीक्षण के मुख्य परीक्षण में उठाए गए मुद्दों तक सीमित होने की आवश्यकता नहीं है। वह मुख्य परीक्षण में न उठाए गए अन्य मुद्दों तक विस्तृत किया जा सकता है। किंतु ये अन्य मुद्दे भी सुसंगत विषय होने चाहिए। ऐसी कोई बात जो या तो मुख्य परीक्षण में या प्रतिपरीक्षण में असंगत है, अनुज्ञेय नहीं है।

अतः जहां तक सुसंगत विषयों का संबंध है मुख्य परीक्षण या प्रतिपरीक्षण में कोई अंतर नहीं है।

(यहां अंग्रेजी पांडुलिपि का पृष्ठ 203 समाप्त होता है। पृ. 205 से निम्नलिखित पाठ्य विषय प्रारंभ होता है - सम्पादक)

यहां सहमति है, कि सत्य बोलने के विशेष गुण का अभाव मनुष्य के विश्वास को हिला देने वाला है जो आवश्यक प्रभाव डालता है और इसीलिए ऐसे प्रश्न जो साक्षी-चरित्र के इस पहलू से संबंधित हैं, हमेशा अनुज्ञेय हैं और प्रति परीक्षण में पूछे जा सकते हैं।

किंतु साक्षी की सत्यवादिता पर सामान्य सुचरित्र के अभाव के संबंध में कोई सामान्य सहमति नहीं है।

इस विषय पर दो दृष्टिकोण हैं। एक है कि सामान्य दुराचरण सत्य बोलने की समर्थता की क्षीणता को अनिवार्यतः समाविष्ट करता है और इसलिए सामान्य आचरणीय पतन को दर्शित करना, सत्यवादिता के अनिवार्य पतन को दर्शित कराना है। दूसरा दृष्टिकोण है, एक सामान्य स्वभाव सत्यवादिता की एक कमी को आवश्यकता या सामान्यतः समाविष्ट नहीं करता है और कि, इसलिए, एक सामान्य दुरस्वभाव एक साक्षी की विश्वसनीयता को हिला देने के प्रयोजन के लिए किसी सम्प्रमाणात्मक मूल्य का नहीं है।

आंग्ल विधि के अंतर्गत, सामान्य चरित्र, चरित्र की क्षति द्वारा विश्वसनीयता को नष्ट करने के प्रयोजन के लिए अपवर्जित है और मात्र सत्यवादिता के लिए चरित्र पर विचार किया जाता है।

प्रतिपरीक्षण से अन्यथा, चरित्र का दोषारोपण

धारा 155

  1. एक साक्षी के चरित्र का दोषारोपण, धारा 155 के प्रावधानों के अंतर्गत स्वतंत्र साक्ष्य के प्रस्तुतीकरण द्वारा अनुज्ञात है।

  2. यह पुनः प्रतिपक्षी पक्षकार का अधिकार है। ताकि एक पक्षकार जो एक साक्षी