लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों से संबंधित है। - Page 43

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

शब्द से सोच समझकर बचा गया है।

ऐसा होने पर उसे शपथ दिलाई जा सकती है और परीक्षित एवं प्रति परीक्षित किया जा सकता है।

धारा 120

प्रतिभूति की अवधि दंडादेश के समाप्त होने पर आरंभ होगी यदि कोई व्यक्ति उस समय पर उसे भोग रहा था।

अन्य मामलों में वह आदेश के दिनांक से प्रारंभ होगी जब तक कि मजिस्ट्रेट एक बाद की दिनांक पर्याप्त कारणों से नियत न करे।

धारा 123

प्रतिभूति देने में असफल होने पर यदि पहले से ही कारागार में हैं तो वह ऐसा विधि के समाप्त होने तक या ऐसे समय के अंतर्गत जब तक वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट जिसने आदेश किया था को प्रतिभूति नहीं देता है तब तक कारागार में ही रखा जाएगा।

  1. जब प्रतिभूति की समयावधि एक वर्ष से अधिक है और प्रतिभूति देने में

असफल है, तो मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश या उच्च न्यायालयों जिसको भी

वाद प्रस्तुत किया जाना है, को लंबित करते हुए उसे कारागार में बंद रखने

का आदेश करेगा।

सत्र न्यायाधीश या उच्च न्यायालय तीन वर्षों से अधिक कारावास के सिवाए कोई भी आदेश पारित कर सकता है।

  1. जब किसी व्यक्ति का मामला निर्देशित किया जाता है तो संयुक्त रूप से

विचारित अन्य व्यक्तियों के मामले भी भेजे जाते हैं। किन्तु उनकी समयावधि

को बढ़ाया नहीं जाएगा।

कारावास

शांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति देने में असफलता पर सादा। धारा 108 एवं 109 के अधीन सदाचरण के लिए सादा। धारा 110 के अधीन कठिन।

धारा 124

  1. डी.एम. (जिला मजिस्ट्रेट) या प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, किसी व्यक्ति के प्रतिभूति देने

में असफल हो जाने पर, यदि उसका मत है कि उसे समाज या अन्य व्यक्ति

के प्रति बिना जोखिम के मुक्त किया जा सकता है, तो आदेश कर सकता है।

  1. जिला मजिस्ट्रेट या प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट प्रतिभूति की धनराशि या प्रतिभूओं की

संख्या या समयावधि जिसके लिए प्रतिभूति अपेक्षित की गई है, को कम भी

कर सकता है।