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- किसी व्यक्ति का उन्मोचन सशर्त या बिना शर्त हो सकता है।
जब समयावधि समाप्त हो जाती है तो शर्त नहीं रहेगी।
मुक्ति का आदेश निरस्त किया जा सकता है यदि प्रतिबंधिता (शर्त) पूरी नहीं की जाती है।
जब सशर्त आदेश निरस्त किया जाता है, तो ऐसा व्यक्ति किसी पुलिस अधिकारी द्वारा बिना वारंट गिरफतार किया जा सकता है और वह जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
जब तक वह मौलिक आदेश की शर्तों के अनुसार प्रतिभूति नहीं देता है तब तक जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को असमाप्त भाग के अधीन कारावास के लिए प्रतिप्रेषित कर सकता है।
यदि वह उसके बाद मौलिक आदेश की शर्तों में प्रतिभूति देता है तो उसे रिहा किया जा सकता है।
कतिपय बाध्यताओं के प्रवर्तन विषयक कार्यवाहियां
(पृष्ठ खाली छूटा - संपादक)
धारा 9 प्रपलायी अपराधी अधिनियम, 1881
उन अपराधों को वर्णित करता है जिनमें एक अधिक्षेत्र से फरार अपराधी समर्पित किया जा सकता है।
धारा 19 (द) भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम
भी ऐसे अपराधों को वर्णित करता है जिनमें एक अधिराज्य से अपराधी समर्पित किया जा सकता है।
क्षेत्रीय अधिकारिता के विषय में।
उसको प्रत्यर्पित करने के बजाए, क्या ब्रिटिश भारत में ब्रिटिश भारत के बाहर कारित अपराध के लिए विचारण किया जा सकता है?
धारा 188
उत्तर है - हां। परन्तु
(1) वह हिज मजेस्टी की देशी भारतीय प्रजा हो।
(2) वह ब्रिटिश प्रजा है और किसी देशी राजा या प्रमुख की सीमाओं के भीतर
अपराध करता है।
(3) वह हिज मजेस्टी का सेवक है (चाहे वह ब्रिटिश जन है या नहीं) और
अपराध किसी देशी राजा या प्रमुख की सीमाओं में किया।
(4) ऐसा अपराधी ब्रिटिश भारत में पाया जाए।
ध्यान दीजिए - धारा 188 विदेशी सीमाओं में कारित अपराधों के विचारण के लिए