लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों से संबंधित है। - Page 49

32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

धारा 487

(1) धारा 480 एवं 485 में यथावधानित के सिवाए किसी दंड न्यायालय का कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के अलावा, किसी व्यक्ति को धारा 195 में निर्दिष्ट अपराध के लिए ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के रूप में न्यायिक प्रक्रिया के अनुक्रम में विचारित नहीं करेगा जबकि ऐसा अपराध स्वयं उसके समक्ष कारित हुआ है या उसके प्राधिकार के अवमान में या उसकी जानकारी में लाया जाता है।

(2) धारा 476 या 482 में कोई बात सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के लिए उपार्पण को अधिकृत सशक्त मजिस्ट्रेट को ऐसे न्यायालय को किसी वाद को स्वयं उपार्जित करने से नहीं रोकेगी।

टिप्पण -

धारा 195 न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाले अपराधों के बारे में है।

धारा अभिव्यक्त करती है कि यदि ऐसा अपराध न्यायाधीश के समक्ष कारित या उसके प्राधिकार के अवमान में किया गया है और उसके प्रज्ञान में लाया जाता है और उसके द्वारा विचारित नहीं किया जाएगा।

जब तक कि मामला धारा 480 एवं 485 के अंतर्गत नहीं उठता है।

अवमान किया गया कोई कार्य या प्रकाशित किया गया लेख जिसका उद्देश्य न्यायालय या न्यायाधीश को अवमान में लाना है या उसके प्राधिकार को निम्न करना है या न्याय के साथ उचित क्रम में या न्यायालय को विधिपूर्वक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना है।

नवियांबेग 10 बी.एच.सी.आर. 73

न्यायाधीश - 1872 की संहिता में न्यायालय शब्द के बदले इस शब्द का निवेशन अयोग्यता को वैयक्तिक बनाता है और किसी अधिकारी विशेष के पद पर उत्तरवर्ती अब ऐसा विचारण कर सकता है।

मजिस्ट्रेट में प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट सम्मिलित है।

12 सी.डब्ल्यू.एन. 246

विचारण में अपील की सुनवाई सम्मिलित है।

चूंकि ऐसा न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का अभिप्राय है कि दंड न्यायालय के न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की हैसियत से विचारण नहीं कर सकता है। यदि यही विषय उसके समक्ष किसी अन्य हैसियत में आता तो वह विचारण कर सकता है।

सामर्थ्य की समरूपता से सुभिन्न वैयक्तिक समरूपता। धारा सामर्थ्य की समरूपता पर आधारित है।

16 कलकत्ता 776 ब