33
18 बंबई 380 ब
प्रतिकूल - 1 मद 305 - अयोग्यता वैयक्तिक समरूपता पर आधारित है।
धारा 556
कोई भी न्यायाधीश उस न्यायालय जिसमें उसके न्यायालय से एक अपील लंबित है की अनुज्ञा के सिवाए किसी वाद या जिसमें वह पक्ष है, या व्यक्तिगत रूप से हितबद्ध है, का विचारण या विचारण के लिए उपार्पण नहीं करेगा और कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट स्वयं अपने द्वारा किए गए निर्णय या पारित आदेश की अपील नहीं सुनेगा।
स्पष्टीकरण - न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट इस धारा के अर्थ के अंतर्गत किसी मामले में केवल इस कारण एक पक्ष या हितबद्ध नहीं समझा जाएगा कि वह एक नगरपालिका उपायुक्त है या अन्यथा लोक हैसियत में सम्बद्ध है या केवल इस कारण कि वह उस स्थान जिसमें अपराध का किया जाना आरोपित है को देखा था या किसी अन्य स्थान जिसमें वाद के लिए तात्विक संव्यवहार का घटित होना आरोपित है और मामले के संबंध में जांच की थी।
पक्षकार -
वैयक्तिक हितबद्ध से मात्र बौद्धिक हित का विवक्षित नहीं है। यह उस व्यक्ति द्वारा जो वाद में हितबद्ध कहा जाता है के लाभ कमाने या किसी क्षति या अलाभ से बचने की प्रत्याशी की प्रकृति की कोई बात विवक्षित है।
8 बम्बई एल.आर. 947
आर्थिक हित
कोई मजिस्ट्रेट जो उस कंपनी का अंशधारक है जो वाद में परिवादी है, वाद में विचारण करने के अयोग्य है।
20 बम्बई 502
मजिस्ट्रेट को एक दंडनीय वाद जिसमें उसका ऋणी व्यक्ति या तो परिवादी या अभियुक्त के रूप में संबंधित है विचारित नहीं करना चाहिए।
संबंध -
मजिस्ट्रेट जो परिवादी का सेवक है अयोग्य होगा।
7 कलकत्ता 322ः 10 कलकत्ता 194
मजिस्ट्रेट जो परिवादी का स्वामी है, अयोग्य नहीं होगा।
9 बम्बई 172
मजिस्ट्रेट जो परिवादी का पति है, अयोग्य होगा।
14 बम्बई 572
487 एवं 556 के बीच अंतर
- धारा 487 उच्च न्यायालय को अयोग्य नहीं मानती है, धारा 556 मानती है।