34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- धारा 487 उपार्पण को अयोग्य नहीं ठहराती है। धारा 556 ठहराती है।
556 एवं 526 (अंतरण) के बीच भिन्नता
वादों में अत्यधिक भ्रामकता है।
अपराध का संज्ञान लेना न कि अपराधी का।
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धारा 129 - मजिस्ट्रेट को एक अवधिपूर्ण जमाव को तितर-बितर करने जिसे अन्यथा विक्षेपित नहीं किया जा सकता, जबकि उसको लोक रक्षा के लिए तितर-बितर करना आवश्यक है, सैन्यबल को बुलाने के लिए सशक्त करता है।
(II) आम दंड के मामले में वादकालीन आदेश पारित करने की शक्ति।
धारा 36
1. साधारण शक्तियां
दंड प्रक्रिया संहिता की तृतीय अनुसूची में वर्णित है। वे मजिस्ट्रेट की श्रेणी के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।
2. अतिरिक्त शक्तियां
स्थानीय सरकार या जिला मजिस्ट्रेट किसी उपखंड मजिस्ट्रेट या प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी मजिस्ट्रेट को कतिपय अतिरिक्त शक्तियों से निर्विष्ट कर सकता है। वे दंड प्रक्रिया संहिता की चतुर्थ अनुसूची में वर्णित हैं। वे मजिस्ट्रेट की श्रेणी के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।
ऐसी शक्तियों के प्रयोग का ढंग
धारा 107 (3) जब मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग या लोक प्रशांति को अस्तव्यस्त कर सकता है, और ऐसी शांति भंग या अस्तव्यस्तता का होना रोका नहीं जा सकता है तो मजिस्ट्रेट उसकी गिरफतारी के वारंट जारी कर सकता है। वह अपने कारण अभिलिखित करेगा।
न्यायालय ऐसे दंडादेश दे सकता है जो विधि द्वारा अधिकृत है। यदि अपराधी न्यायालय से अपने लिए विधि की अपेक्षा के स्थान पर ऐसा दंडादेश देने के लिए कहता है जिसे विधि अनुमत नहीं करती है तो ऐसा दंडादेश विधि मान्य नहीं होगा।
3 बी.एल.आर. - 50
लघुकरण दंड संहिता की धारा 59 इंगित करती है कि किन वादों में कारावास के स्थान पर निर्वासन का दंडादेश किया जा सकता है।
कारावास के स्थान पर निर्वासन केवल सारवार दंड के रूप में प्राधिकृत है। नौ वर्षों के निर्वासन एवं रु. 300/- का जुर्माना और अनअदायगी पर 3 वर्षों का और आगे निर्वासन का दंडादेश आदेश के परवर्ती भाग के संबंध में अनुपयुक्त है।
5 मद्रास 28