पुनरीक्षण अधिकारिता - Page 70

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च.डी. 286 (314)

ध्यान देने के लिए विचार बिन्दु।

  1. दुर्निरूपण विद्यमान तथ्यों के सम्बन्ध में होना चाहिए और केवल अभीच्छा के सम्बन्ध में नहीं।

आर.एल. केसेज 185

दृष्टांत

  1. एक व्यक्ति का एक विधिक अधिकार है किन्तु उसके सृजन और उसके प्रवर्तन के प्रयास के समय के बीच, वह उसको त्यागने की अपनी अभीच्छा को प्रस्तुत कर देता है।

  2. वहां विबंधन नहीं हो सकता जहां विषय की सत्यता दोनों पक्षों को भली भांति ज्ञात है।

30 कलकत्ता 539 पी.सी. मोहोरी बनाम धरमदास चोसे।

20 जुलाई, 1895 को दामोदर दास ने एक साहूकार ब्रह्मदत्त के यहां कुछ गिरवी रखा। संपूर्ण व्यवहार में ब्रह्मदत्त अनुपस्थित था और उसके मुख्तार केदारनाथ के द्वारा सारा कार्य किया गया, धन ब्रह्मदत्त के स्थानीय प्रबंधक देदराज कोठारी को दिया गया। जब कार्य किया जा रहा था तब दामोदर-दास की मां ने मुख्तार केदारनाथ को पत्र लिखा कि दामोदर-दास नाबालिग है और यदि कोई व्यक्ति धन देता है तो वह अपने जोखिम पर देगा।

गिरवी रखने के दिन केदारनाथ ने एक बड़ा घोषणा पत्र दामोदर-दास से लिया कि वह वयस्क था।

10 सितम्बर, 1895 को, इस आधार पर कि डी. नाबालिग था, मां ने एक मामला बन्धक-पत्र को समाप्त करने के लिए प्रस्तुत किया।

ब्रह्मदत्त का विवाद था कि दामोदर विबंधित था। फैसला हुआ कि वह वास्तव में तथ्य को जानना जानने के साधान होने से भिन्न होता है, नहीं था क्योंकि तथ्य ब्रह्मदत्त को ज्ञात था।

एल.आर. 20 सी.एच.डी. 1 रेडग्रेव बनाम हर्ड।

वादी ने निरूपित किया कि उसके कारोबार से 300 पाउंड वार्षिक आय होती थी और उसके 2/3 को दर्शाने वाले तीन संक्षिप्त विवरण कुछ कागजात के साथ प्रस्तुत किए जिनका प्रतिवादी ने परीक्षण नहीं किया। इस विश्वास पर वादी के कारोबार को खरीदने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, और जमा राशि अदा की। कारोबार को बेकार पाते हुए उसने सम्पन्न करना अस्वीकार कर दिया और वादी ने विशिष्ट निष्पादन के लिए उस पर दावा किया। वादी का विवाद था कि प्रतिवादी यह करने से विबंधित था कि वादी का निरूपण असत्य था क्योंकि उसके पास सत्य को जानने के साधन थे।