पुनरीक्षण अधिकारिता - Page 71

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

जैसल एम.आर.पी. 21

जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को तथ्य वर्णन करके, जो असत्य है, संविदा करने के लिए उकसाता है, यह संविदा के निरसन की कार्रवाई का कोई बचाव नहीं है कि जिस व्यक्ति को वर्णन किया गया था, उसके पास साधन थे अथवा उचित सम्यक से

खोज की कि यह असत्य था। यह दर्शाया जाए कि उसे वर्णन के विपरीत तथ्य का ज्ञान था अथवा यह कि उसने इस संबंध में अथवा अपने आचरण द्वारा स्पष्टतः प्रदर्शित किया कि उसने वर्णन पर विश्वास नहीं किया।

II. विबंधन के नियम में द्वितीय तत्त्व, अभिप्राय है कि वादी को कथन के विश्वास पर कार्य करना चाहिए।

यह आवश्यक नहीं है कि निरूपण करने वाला पक्ष स्वयं किसी गलती पर नहीं होना चाहिए था।

यह आवश्यक नहीं है कि निरूपण करने वाले पक्ष ने निश्चित रूप से भ्रमित करने या धोखा देने के अभिप्राय से कार्य किया है।

19 आई.ए. 203

किन्तु यह आवश्यक है कि निरूपण करने वाले पक्ष का यह अभिप्राय अवश्य होना चाहिए कि उसे प्रतिवेदन पर विश्वास करके कार्य करना चाहिए।

इरादा कैसे प्रमाणित किया जाए?

अभीच्छा दो भिन्न अभिप्राय से प्रयोग की जाती हैः-

(1) यह एक विधिक धारणा को इंगित करने के लिए उपयोग की जाती है। एक

व्यक्ति के बारे में अनुमान लगाया जाता है कि वह अपने कार्यों के स्वाभाविक

और आवश्यक परिणामों को जानता हो।

(2) अभीच्छा एक व्यक्ति की एक विशिष्ट विद्यमान मानसिक स्थिति को इंगित

करने के लिए उपयोग की जाती है।

यह विशिष्ट मानसिक स्थिति किसी अन्य तथ्य की भांति एक तथ्य के रूप में अवश्य प्रमाणित की जानी चाहिए, और इसकी धारणा नहीं की जा सकती।

दृष्टांतः-

(1) धारा 225 भा.दं.सं. जो कोई इच्छा से प्रस्तुत करता है।

(2) धारा 124 भा.दं.सं. जो कोई इच्छा के साथ।

यहां अभीच्छा विधिक धारणा के रूप में उपयोग की जाती है और दूसरे भाव में प्रयुक्त नहीं की जाती।

अतः अभीच्छा को सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि पक्ष को एक विशिष्ट तथ्य के रूप में कार्य करना चाहिए।