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यदि एक विवेकी व्यक्ति निरूपण को सत्य मानता है और विश्वास करता है कि इसका तात्पर्य था कि उसे उस पर कार्य करना चाहिए, तो जरूरत जो अभीच्छा की तरह है संतुष्ट हो जाएगी।
191 आई.ए. 203 (219)
III :-
विबंधन के नियम का तृतीय तत्त्व है कि पक्ष जिसके प्रति निरूपण किया गया था, उसको इसके विश्वास पर अवश्य कार्य करना चाहिए।
- यह तत्त्व वस्तुतः विबंधन की विधि का आधार है और इसके मूल सिद्धांत
की व्याख्या करता है। विबंधन के नियम का मूल सिद्धांत है कि निश्चिततः
अनुचित अन्याय पूरक होना चाहिए, कि यदि एक व्यक्ति एकीकृत निरूपण
द्वारा या निरूपण के समान हुए आचरण के द्वारा एक अन्य व्यक्ति को
प्रेरित करता है जो वह अन्यथा न कर पाएगा, वह व्यक्ति जिसने निरूपण
किया था उस व्यक्ति जिसने उस पर कार्य किया था, को हानि एवं क्षतिपूर्ति
पूर्ववर्ती कथन के प्रभाव को अस्वीकार या खंडित करने के लिए अनुमत
होना चाहिए।
- इस नियम का कारण है कि वह व्यक्ति उस पर कार्य कर चुका है और
अपनी स्थिति को परिवर्तित कर चुका है। विबंधन के समान होने के लिए
कथन पर जो उस पक्ष द्वारा जिसके प्रति किया था, अवश्य ही कार्य किया
जाना चाहिए।
14 बम्बई 312
13 मूआई.ए. 585 (599)
विबंधन के नियम पर सीमाबन्धन।
- यह स्थानीय विधि को रद्द नहीं कर सकता।
( i ) अवयस्क-स्वयं को वयस्क के रूप में निरूपित करता हैं - सिद्ध करने से
विबंधित नहीं।
( ii ) निगम - कार्य करता है जो अधिकारातीत है - सिद्ध करने से विबंधित नहीं
हुआ कि वे उसके अधिकार से परे थे।
स्वीकरणों और विबंधन के बीच अन्य भिन्नताएं।
- एक स्वीकरण, पक्ष को यह सिद्ध करने से रोकता नहीं है कि स्वीकरण असत्य
है। एक विबंधन पक्ष को ऐसा करने से रोकता है।
- एक स्वीकरण का लाभ, उस व्यक्ति जिसके प्रति वह किया गया था के अलावा
अन्य कोई भी व्यक्ति ले सकता है। एक विबंधन का लाभ केवल उसी पक्ष द्वारा
लिया जा सकता है जिसके लिए वह किया गया था। चूंकि एक अपरिचित के