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(ब) साक्ष्य अधिनियम द्वारा। धारा 40-44
प्रलेख द्वारा विबंधन
आंग्ल विधि के अंतर्गत एक प्रलेख के प्रति एक पक्ष किसी भी तरीके से
अपने और अन्य पक्ष के बीच उस प्रलेख में कथन के विपरीत नहीं कह
सकता। यह नियम आंग्ल विधि में एक ‘मुहर’ के महत्त्व का अतिशयोक्तिपूर्ण
उदाहरण प्रस्तुत करता है। मोहर लगाने के लिए, न मोम और न पानी की
आवश्यकता है। प्रकटतः अभिलेख पर स्याही का एक धब्बा विलेख है। यदि
ऐसा सोचा जाता और यह सोच समझकर किए हुए और पहचान किए हुए
हस्ताक्षरों से कहीं अधिक विधि में महत्त्व बनाता है। साधारण हस्ताक्षरित
अभिलेख के मामले में कोई विबंधन नहीं है।
- प्रलेख द्वारा विबंधन के दृढ़ तकनीकी मत का भारत में विद्यमान होना नहीं
कहा जा सकता है।
- किन्तु जबकि इस देश में तकनीकी मत की कोई जरूरत नहीं है लेकिन
अभिलेखों में कथन, पक्षों के विरुद्ध, स्वीकरणों के रूप में, संविदा साक्ष्य
है। कुछ मामलों में ऐसा एक कथन परिस्थितियों के अनुसार कुछ न कुछ
साक्ष्यात्मक मूल्य का एक स्वीकरण मात्र होता है, किन्तु निर्णायक नहीं।
अन्य मामलों में अर्थात् जिनमें दूसरा पक्ष, उस अभिलेख में समाहित कथन
के विश्वास पर उसकी मौजूदगी वैकल्पित करने के लिए, प्रेरित किया जाता
है तो ऐसा कथन या अन्य विलेख से पैदा होने वाला विबंधन, धारा 115
के अंतर्गत आचरण या दुर्निरूपण द्वारा उस विबंधन की केवल एक विशेष
प्रयुक्ति है।
- साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक विबंधन उद्भूत नहीं होता क्योंकि केवल
एक कथन एक प्रलेख में अंतर्विष्ट होता है, जब वह धारा 115 के साथ
आ सकता है तभी वह एक विबंधन का काम कर सकता है।
I. इलाहाबाद 403
II. बम्बई 708
- एक प्रलेख में एक वृत्तांत परिस्थितियों के अनुसार केवल एक स्वीकरण हो
सकता है या एक विबंधन हो सकता है।
विशेष विबंधन
- धारा 115 सामान्यतः विबंधनों के प्रयोग में आती है। धारा 116 एवं 117
विशेष विबंधनों के साथ आती है।
- धारा 115 के अंतर्गत विबंधनों और धारा 116-117 के अंतर्गत विबंधनों के
मध्य भिन्नता उल्लिखित की जा सकती है।