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अपवर्जित नहीं करेगा। नियम जो ‘‘पूर्वाग्रह के बिनए’’ चिर्तिं प्रलेखों को अपवर्जित करता है, की प्रयुक्ति नहीं है जब तक कि कोई व्यक्ति विवाद में या एक अन्य व्यक्ति के साथ परक्राम्यता में नहीं है और विवाद या परक्राम्यता के निर्धारण के लिए निबंधन प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं।
23 बम्बई, 177 (180)
स्पष्टीकरण
जहां एक व्यक्ति उत्तर देने के लिए बाध्य किया जाता है यह धारा प्रयुक्त नहीं होती है।
विषय जो असंगत हैं
साक्ष्य विधि व्यक्त नहीं करती है कि कौन से विषय असंगत हैं।
यह जो विषय सुसंगत हैं को अभिव्यक्त करती है और जो विषय सुसंगत
नहीं है उनको अपवर्जित करती है।
- यह प्रतिवादित किया जाता है कि सुसंगतता के नियम किसी उपयोग के नहीं
हैं।
- दो समस्याएं हैं जिनके साथ न्यायाधीश का सामना होता है।
(i) क्या और कहां तक उसका विश्वास करना चाहिए जो साक्षी कहता
है?
(ii) एक न्यायाधीश को उन तथ्यों से, जिन्हें वह प्रमाणित हो चुके हुए
मानता है, क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए?
प्रत्येक न्यायिक कार्यवाही में दो आवश्यक प्रश्न होते हैं - क्या यह सत्य है? और यदि सत्य है तब क्या हो?
- सुसंगतता के नियम उनमें से एक पर भी प्रकाश नहीं डालते और वे व्यक्ति
एक श्रेष्ठतर उत्तर दे सकते हैं जो इन नियमों से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं।
- प्रतिवादी के उत्तर -
(i) तर्कशास्त्र का अध्ययन किए बिना भी, लोग तर्क करते हैं, और अच्छे
तर्क करते हैं। किन्तु यह अनुसरण नहीं होता कि हमको तर्कशास्त्र
का अध्ययन करना चाहिए।
(ii) असंगत गपशप की बाढ़ और प्रासंगिक प्रश्नों से निकले सुसंगतता के
नियम, जो दृढ़तर मस्तिष्क में समाविष्ट होने और सर्वाधिक समवेत
मस्तिष्क को भ्रमित करने को पर्याप्त हैं।
I. सुसंगतता का मूलभूत नियम है कि आप एक तथ्य को प्रमाणित कर सकते हैं और राय नहीं दे सकते।
तथ्य दो वर्गों में आते हैंः