पुनरीक्षण अधिकारिता - Page 97

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

ऐसे व्यक्ति द्वारा एक साक्षी के रूप में एक पूर्ववर्ती न्यायिक कार्यवाही में या उसे लेने के लिए प्राधिकारित किसी व्यक्ति के समक्ष दिया गया साक्ष्य

एक तदनन्तर न्यायिक कार्यवाहियों में या उसी न्यायिक कार्यवाही के एक पूर्ववर्ती चरण में, उसमें व्यक्त तथ्यों के सत्य को प्रमाणित करने के लिए, प्रस्तुत किया जा सकता है।

परन्तु

(i) कि कार्यवाही उन्हीं पक्षों या उनके हितैषियों के मध्य थी।

(ii) कि प्रथम कार्यवाही में विरोधी पक्ष को प्रतिपरीक्षण का अधिकार और सुयोग

था।

(iii) कि प्रथम कार्यवाही में वही वास्तविक विवाद्यक प्रश्न थे जैसे कि द्वितीय

कार्यवाही में, (आगे अंश सुलभ नहीं - संपादक)

35. किसी पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख में प्रविष्टियां

1. ग्राह्यता की शर्तें

(i) धारा में प्रविष्टियों के दो वर्ग अपेक्षित हैं। (अ) लोक सेवक द्वारा और (ब) लोक सेवकों से पृथक व्यक्तियों के द्वारा। यदि वह लोकसेवक द्वारा है तब वह उसके कर्त्तव्य निर्वहन करने के समय होना चाहिए। यदि वह उन व्यक्तियों के द्वारा है, जो लोक सेवक नहीं है, तब प्रविष्टि करने का कर्त्तव्य विशेषतः विधि द्वारा व्यादेशित होना चाहिए। पहला चर्चा का विषय है। बाद का निर्देशन का विषय है।

(ii) पुस्तक, पंजी, अभिलेख या तो जनसाधारण का हो या शासकीय हो।

शासकीय का अभिप्राय कार्यालय के प्रयोग के लिए नहीं वरन् इसका अभिप्राय है कि राज्य द्वारा व्यक्त जो किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा व्यक्त वस्तु से भिन्न है।

जनसाधारण का अभिप्राय है जनता के उपयोग के लिए। जनता का अभिप्राय प्रत्येक व्यक्ति के लिए ख्ुला नहीं है। इसका अभिप्राय है व्यक्ति के लिए जो इससे संबंधित है।

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(iii) पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख किसी पुस्तक में हो सकता है, पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख किसी देश मेंरखा हो, भारत में आवश्यक नहीं बशर्ते कि इसने प्रतिबंधिताओं को संतुष्ट किया हो। किसी बाह्य देश की एक पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख में एक इंदराज प्रमाणित की जा सकती है।

ध्यान देने योग्य बिंदु

(1) इंदराज साक्ष्य है, यद्यपि व्यक्ति जिसने उसको किया जीवित है और एक साक्ष्य

के रूप में बुलाया नहीं गया है - लोक एवं शासकीय प्रलेखों के प्रमाण के लिए,

देखें धारा 76-78