एक - कोरेगांव - Page 19

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

तुरन्त उछलने-कूदने लगे और एक तरफ लेमन की बोतल का ऑर्डर दे दिया। थोड़ी देर में सीटी बजाती हुई गाड़ी आ गई और हम पीछे न रह जाएं, इस डर से जल्दी ही गाड़ी में चढ़ गए। हमें मसूर में गाड़ी से उतरने के लिए कहा गया था जो कोरेगांव से सबसे निकट का स्टेशन था।

गाड़ी मसूर में शाम को 5 बजे पहुँची और हम अपने सामान के साथ उतर गए। कुछ ही मिनटों में जो यात्री गाड़ी से उतरे थे अपने-अपने गंतव्य स्थान को चले गए। हम चार बच्चे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रह गए और अपने पिता या उनके नौकर को, जिसको उन्होंने भेजने का वचन दिया था, देखने लगे। बहुत देर तक हमने प्रतीक्षा की लेकिन वहाँ कोई नहीं आया। एक घंटा बीत गया और स्टेशन मास्टर पूछने के लिए आया। उन्होंने हमसे हमारी टिकटें मांगी हमने अपनी टिकटें उनको दिखा दीं। उन्होंने हमसे पूछा कि हम क्यों रुके हैं। हमने उनसे कहा कि हमें कोरेगाँव जाना था और हम अपने पिताजी या उनके नौकर के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन अभी तक कोई नहीं आया है और अब हम कोरेगाँव कैसे पहुँचें। हमने अच्छे कपड़े पहने थे। हमारे कपड़ों और बातचीत से कोई यह नहीं पहचान सकता था कि हम अछूत हैं। स्टेशन मास्टर को विश्वास था कि हम ब्राह्मण बच्चे हैं और वह हमें इस दशा में देखकर द्रवित हुआ। जैसा कि हिन्दुओं में आमतौर पर होता है, स्टेशन मास्टर ने पूछा कि हम कौन हैं। एक भी क्षण सोचे बिना मैंने कहा कि हम महार हैं। महार एक ऐसी जाति है जो बम्बई प्रेसीडेन्सी में अछूत मानी जाती है। उसे अचम्भा हुआ। उसका चेहरा अचानक बदल गया। हम देख रहे थे कि वह दुःखी था। जैसे ही उसने मेरा उत्तर सुना वह अपने कमरे में चला गया और हम वहीं खड़े रहे जहां खड़े थे। पंद्रह-बीस मिनट गुज़रे, सूर्य लगभग छिप रहा था। पिताजी नहीं आए थे और न ही उन्होंने नौकर को भेजा था और अब स्टेशन मास्टर भी हमको छोड़कर चला गया था। हम पूरी तरह परेशान थे। जो

खुशी और प्रसन्नता हमने यात्रा आरम्भ करने पर महसूस की थी वह खत्म हो गई थी और अब हम उदास हो गए थे। आधे घंटे के पश्चात् स्टेशन मास्टर लौटा और उसने हमसे पूछा कि हम क्या करना चाहते हैं। हमने कहा कि यदि हमको कोई बैलगाड़ी किराए पर मिल सके तो हम कोरेगाँव चले जाएंगे और यदि यह बहुत दूर नहीं है तो हम तुरंत चलना चाहेंगे। वहां बहुत-सी बैलगाडि़याँ किराए के लिए खड़ी थीं। लेकिन गाड़ी वालों ने स्टेशन मास्टर को यह बताते हुए सुन लिया था कि हम महार हैं। उनमें से कोई गन्दा होने को तैयार नहीं था और अछूत वर्गों के बच्चों को ले जाकर अपनी प्रतिष्ठा कम नहीं करना चाहता था। हम दोगुना किराया देने को तैयार थे। लेकिन हमने देखा कि पैसा कुछ नहीं करता। स्टेशन मास्टर जो हमारी ओर से सौदा कर रहा था चुपचाप खड़ा देख रहा था कि क्या करे। अचानक एक विचार उसके दिमाग में आया और उसने हमसे पूछा, फ्तुम गाड़ी चला सकते हो?य् यह समझकर कि वह हमारी