एक - कोरेगांव - Page 20

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कठिनाइयों का हल ढूंढ रहा है, हम बोल उठे फ्हाँय् हम चला सकते हैं। हमारा उत्तर सुनकर वह चला गया और हमारी ओर से प्रस्ताव किया कि हम गाड़ीवान को दोगुना किराया देंगे और बैलगाड़ी स्वयं चलाएंगे। गाड़ीवान को हमारे साथ केवल पैदल चलना होगा। एक गाड़ीवान तैयार हो गया क्योंकि इस प्रकार उसे किराया भी मिल गया और वह गन्दगी से भी बच गया।

जब हम चलने को तैयार थे तो शाम के करीब 6ः30 बजे थे। लेकिन हम स्टेशन छोड़ने के लिए उस समय तक तैयार नहीं थे जब तक यह विश्वास न दिला दिया जाए कि हम कोरेगाँव अंधेरा होने से पूर्व पहुँच जाएंगे। अतः हमने गाड़ीवान से पूछा कि कोरेगाँव यहाँ से कितनी दूर है और वहां पहुंचने में कितना समय लगेगा। उसने हमें विश्वास दिलाया कि कोरेगाँव पहुंचने में तीन घंटे से ज्यादा नहीं लगेंगे। उसके शब्दों पर विश्वास करके, हमने अपना सामान गाड़ी में रख दिया। स्टेशन मास्टर को धन्यवाद दिया और गाड़ी में बैठ गए। हम में से एक ने बैलों की लगाम पकड़ी और गाड़ी चल दी - गाड़ीवान गाड़ी के साथ चल रहा था।

स्टेशन से थोड़ी दूर पर एक नदी बहती थी जो बिल्कुल सूखी थी। कुछ ही स्थानों पर गड्ढे थे जिसमें पानी भरा था। गाड़ी वाले ने प्रस्ताव किया कि हम वहां ठहर कर अपना खाना खा लें क्योंकि फिर कहीं पानी नहीं मिलेगा। हम सहमत हो गए। उसने हमें कुछ किराया देने के लिए कहा जिससे वह गाँव में जाकर कुछ खा सके। मेरे भाई ने कुछ पैसे उसे दिए और शीघ्र लौटने का वायदा करके वह चला गया। हम बहुत भूखे थे और कुछ खाने का अवसर पाकर बहुत प्रसन्न हुए। मेरी चाची ने पड़ोस की औरतों से कुछ अच्छे-अच्छे पकवान रास्ते में खाने के लिए हमारे लिए तैयार करवा लिए थे। हमने टिफिन खोला और खाना आरम्भ किया। हमें बर्तन धोने के लिए पानी की आवश्यकता थी। हममें से एक पास की नदी के गड्ढे से पानी लेने गया लेकिन वह पीने लायक पानी नहीं था। वह कीचड़ और गाय भैंस के पेशाब और गोबर का मिश्रण था, जो वहाँ पानी पीने आते थे। वास्तव में वह पानी मनुष्यों के प्रयोग के लिए नहीं था। पानी की दुर्गंध इतनी अधिक थी कि हम उसे पी नहीं सकते थे। अतः संतुष्ट होने से पूर्व ही हमने अपना खाना बंद कर दिया और गाड़ीवान की प्रतीक्षा करने लगे। वह बहुत दूर तक नहीं आया और हम जो कर सकते वह यह था कि उसे चारों ओर देखते रहे। अन्त में वह आया और हमने यात्रा आरम्भ कर दी। चार-पांच मील तक हमने गाड़ी चलाई और वह पैदल चलता रहा। फिर वह अचानक उछलकर गाड़ी पर बैठ गया और लगाम अपने हाथ में ले ली। हमें गाड़ीवान के इस आचरण पर बड़ा आश्चर्य हुआ। पहले तो उसने गन्दा होने के डर से हमें गाड़ी देने से इन्कार कर दिया था और अब सभी धार्मिक संकोच त्याग कर उसी गाड़ी में हमारे साथ बैठने को तैयार हो गया किन्तु हमने इस बारे में उससे कोई प्रश्न करने की हिम्मत नहीं की। हम जल्दी अपनी मंजि़ल गोरेगाँव