एक - कोरेगांव - Page 22

7

ओर लौट आया और उसका उत्तर भाई को बता दिया। मैं नहीं जानता कि मेरे भाई ने कैसा महसूस किया। उसने हमें सिर्फ सो जाने को कहा।

बैलगाड़ी के जुए से खोल दिए गए थे और गाड़ी ज़मीन पर टेक दी गई थी। हमने अपने बिस्तर गाड़ी में नीचे बने तख्ते पर बिछा दिए और आराम के लिए लेट गए। चूँकि अब हम सुरक्षित स्थान पर पहुँच गए थे, जो कुछ हुआ हमने महसूस नहीं किया। लेकिन हमारा दिमाग नवीनतम घटना की ओर चला ही गया। हमारे पास बहुत खाना था। हमारे अन्दर भूख की अग्नि जल रही थी। यह सब होते हुए भी हमें खाना खाए बिना सोना पड़ रहा था क्योंकि हमें पानी नहीं मिला और पानी इसलिए नहीं मिला कि हम अछूत थे। यह विचार हमारे मन में आया। मैंने कहा, हम सुरक्षित स्थान पर आ गए हैं। मेरे बड़े भाई को कुछ भ्रान्ति हुई। उसने कहा कि हम चारों के लिए सो जाना विवेकपूर्ण नहीं है। कुछ भी हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक समय में दो को सोना चाहिए और दो को पहरा देना चाहिए। इस प्रकार हमने पहाड़ी के नीचे रात बिताई।

प्रातः 5 बजे हमारा गाड़ीवान आया और सुझाव दिया कि हमें गोरेगाँव के लिए चल देना चाहिए। हम लोगों ने साफ मना कर दिया। हमने उससे कहा कि हम आठ बजे से पहले नहीं चलेंगे। हम कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे। उसने कुछ नहीं कहा। इस प्रकार हमने 6 बजे चलना शुरू किया और गोरेगाँव11 बजे पहुंचे। मेरे पिताजी हमें देखकर हैरान हुए और कहा कि उन्हें हमारे आने की सूचना नहीं मिली है। हमने कहा कि सूचना तो दी थी। उन्होंने इस तथ्य से इन्कार कर दिया। बाद में पता लगा कि मेरे पिताजी के नौकर की गलती थी। उसने हमारा पत्र प्राप्त कर लिया था लेकिन पिताजी को नहीं दिया था।

यह घटना मेरे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। जिस समय घटना हुई मैं नौ वर्ष का बालक था। लेकिन इसने मेरे दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी। यह घटना होने से पूर्व मैं जानता था कि मैं एक अछूत हूं और अछूतों को कुछ अपमान और भेदभाव सहन करने पड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर मैं जानता था कि मैं अपनी कक्षा के छात्रों के बीच अपने क्रम के अनुसार नहीं बैठ सकता था, अपितु मुझे स्वतः एक कोने में बैठना होता था। मैं जानता था कि स्कूल की सफाई करने के लिए रखा नौकर मेरे उस टाट को नहीं छुएगा जिसका मैं प्रयोग करता हूं। मुझे टाट का टुकड़ा शाम को अपने साथ ले जाना होता था और उसके अगले दिन प्रातः अपने साथ लाना होता था। स्कूल में सवर्णों के बच्चे प्यास लगने पर नल से पानी लेकर प्यास बुझा सकते थे। इसके लिए उन्हें केवल अध्यापक की इजाजत लेनी होती थी। मेरी स्थिति अलग थी। मैं नल को छू नहीं सकता था और जब तक इसे कोई सवर्ण व्यक्ति खोलता नहीं था, मैं अपनी प्यास नहीं बुझा सकता था। मेरे मामले में अध्यापक की अनुमति लेना काफी नहीं था।