दो - बड़ौदा - Page 27

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

सराय में ठहरने का मेरा ग्यारहवाँ दिन था। मैंने प्रातः का खाना खा लिया था और कपड़े पहन लिए थे और कार्यालय जाने के लिए अपने कमरे से निकलने वाला था। जैसे ही मैं कुछ किताबें पुस्तकालय को लौटाने के लिए उठा रहा था जो मैंने रात को पढ़ने के लिए पुस्तकालय से ली थीं, मुझे ऊपर आते हुए बहुत-से लोगों की पगध्वनि सुनाई दी। मैंने सोचा कि कुछ पर्यटक ठहरने के लिए आए हैं और इसलिए मैं बाहर देख रहा था कि वे कौन हैं, तभी मैंने देखा कि एक दर्जन नाराज दिखाई देने वाले लम्बे तगड़े, जो एक-एक लाठी उठाए हुए थे, मेरे कमरे की ओर आ रहे हैं। मैं समझ गया कि वे साथी पर्यटक नहीं हैं और उन्होंने इसका सबूत तुरन्त दे दिया। वे मेरे कमरे के सामने पंक्ति में खड़े हो गए और प्रश्नों की बौछार शुरू कर दी। फ्तुम गन्दे हो। तुम यहाँ क्यों आए? तुमने पारसी नाम रखने का साहस कैसे किया? तुम गुण्डे! तुमने पारसी सराय को प्रदूषित किया है। मैं चुपचाप खड़ा रहा, कोई उत्तर नहीं दे सका। मैं यह भी नहीं कह सकता था कि मैं पारसी ही हूं। वास्तव में यह धोखा था और धोखा खुल गया और मुझे विश्वास है कि यदि मैं अपने आपको पारसी बताता रहता, तो कुछ और धर्मान्ध पारसियों की भीड़ ने मेरी पिटाई कर दी होती और संभवतः मार ही दिया होता। मेरी नम्रता और मेरी चुप्पी ने इस दुर्भाग्य को टाल दिया। उनमें से एक ने पूछा कि कमरा कब खाली करने का मेरा इरादा है। उस समय मेरे लिए सिर छिपाने की जगह मेरे लिए मेरे जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण थी। इस प्रश्न में की गई धमकी बहुत बड़ी थी। अतः मैंने अपनी चुप्पी तोड़ी और निवेदन किया कि वे मुझे कम से कम एक सप्ताह और रहने दें क्योंकि मेरा विचार था कि मैंने मंत्री को बंगले के लिए जो अर्जी दी हुई थी उस पर इस बीच में मेरे पक्ष में फैसला हो जाएगा। लेकिन पारसी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अन्तिम निर्णय दे दिया। उन्होंने मुझे शाम तक सराय से चले जाने के लिए कह दिया। उन्होंने गम्भीर परिणामों की धमकी दी और चले गए। मैं असमंजस में था। मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर बैठ रहा था। मैंने सबको कोसा और फूट-फूट कर रोया। अन्ततः मुझे उस सिर छिपाने की जगह से, जो मेरे लिए बड़ी कीमती थी, वंचित कर दिया गया। यह एक कैदी की कोठरी से अच्छी जगह नहीं थी। लेकिन यह मेरे लिए बहुत कीमती थी।

पारसियों के चले जाने के बाद मैं कुछ देर तक बेठा कोई रास्ता ढूंढने के बारे में सोचता रहा। मुझे आशा थी कि शीघ्र ही सरकारी बंगला मिल जाएगा और मेरी तकलीफें दूर हो जाएंगी। मेरी समस्या अस्थाई समस्या थी और मैंने सोचा कि दोस्तों के यहां जाना अच्छा होगा। बड़ौदा राज्य के अछूतों में मेरा कोई मित्र नहीं था। लेकिन दूसरे वर्गों में मेरे मित्र थे। एक हिन्दू था, दूसरा एक भारतीय ईसाई था। मैं पहले अपने हिन्दू मित्र के यहां गया और जो कुछ मेरे साथ हुआ सब कह सुनाया। वह अच्छा व्प्यक्ति था और मेरा व्यक्तिगत मित्र था। वह दुःखी और गुस्से में भी था। फिर भी उसने एक विचार