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के पास भेजा था। प्लिनी ख्2, ने मोदुरा (मदुरा) का उल्लेख किया है तथा क्लैमी ने भी इस कस्बे का जिक्र 40 अन्य कस्बों के साथ किया है। यह कहा जाता है कि मजीरीस में आगस्टस को समर्पित एक मन्दिर था जो क्रेगनोरे के नाम से जाना जाता था। आदिकाल से प्रायद्वीप का दक्षिणी क्षेत्र पांडया, चेरा और चोल नामक तीन राज्यों में विभाजित था। ख्3, पहले के अंतर्गत मदुरा और तिचेवेल्ली जिले आते थे। चेरा और केरल पश्चिमी-तट पर आधुनिक त्रावनकोर में थे। चोल देश में तंजौर त्रिचीनोपल्ली, मद्रास और मैसूर के अधिकांश भाग आते थे। छठी से आठवीं शताब्दी तक पल्लवा नामक चौथी महत्त्वपूर्ण शक्ति थी जो स्पष्टतः मद्रास महाप्रांत के उत्तर से आए थे। इनकी राजधानी कांजीवरम में थी और शेष तीनों राज्यों से इनकी प्रायः लड़ाई रहती थी। उनके राजा, नरसिंहा (625-645 ई.) ने वर्मन दकन के कुछ भाग और चोल राज्यों के बड़े भाग पर शासन किया लेकिन लगभग 750 ई. के बाद इनका पतन आरम्भ हुआ जबकि चोल मजबूत होने लगे और राजराजा (985-1018 ई.) ने, जिनके उपनिवेशों में मद्रास महाप्रांत और मैसूर शामिल थे, दक्षिण भारत में इनको सर्वोत्तम शक्ति बना दिया और वे तेरहवीं शताब्दी तक शक्ति बने रहे।
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, दकन पर 220 ई. पूर्व से 236 ई. तक आंध्रों ने राज्य किया, लेकिन उसके पश्चात् 300 वर्ष तक इसके इतिहास के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। यह स्थिति तब तक बनी रही जब तक कि बीजापुर के बतापी (बादामी) में चालुक्य राजवंश का उत्थान नहीं हुआ। इस राजवंश के पुलकेसिन II (600-642 ई.), जो हर्ष के समकालीन थे, कुछ समय तक एक विरोधी साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए जो गुजरात से मद्रास तक फैला हुआ था, और वह इतना शक्तिशाली था कि उसने पार्शिया के राजा खुसरू द्वितीय से राजदूतों का आदान-प्रदान किया जैसा कि अजन्ता के प्लास्टर में मिलता है लेकिन 642 ई. में उसे पल्लवा राजाओं ने हराकर उसके साम्राज्य का अंत कर दिया। पुलाकेसिन और हर्ष की मृत्यु के पश्चात् राजपूत-काल आरम्भ होता है जों 650 से 1000 ई. तक चलता रहा। इस अवधि के दौरान कई राज्य अस्तित्व में आए जिन पर नाम के लिए हिन्दु राजवंशों का शासन था जो प्रायः उत्तर के आक्रांताओं या गैर-हिन्दु आदिवासी कबीलों की संतान थे। उनमें निम्नलिखित हैंः
- कन्नौज या पांचाल - हर्ष की मृत्यु के पश्चात् यह राज्य अनेकों कठिनाइयों से गुजरा लेकिन 840 से 910 ई. तक भोज (या मिहिर) और उसके पुत्र के अधीन यह उत्तर भारत में प्रमुख शक्ति बन गया और बिहार से सिंध तक उसका विस्तार हो गया। 12वीं शताब्दी में यह फिर से गहरवार राजवंश के अधीन महत्त्वपूर्ण बन गया।
3. ‘अशोका अभिलेखों’ में चार राज्य है - पोंड्या, केरालापुत्रा, कोला और सत्यपुत्र