3. भारत के इतिहास पर टिप्पणियाँ - Page 60

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होता है वह खोतान का था, न कि बैक्ट्रिया का। निस्संदेह वह कापसी परोषण ख्1, में गर्मियाँ तथा सर्दियाँ पुरुषपुर (पेशावर) में बिताता था। ग्रीको-ईरानियन (देश का मध्य) अब उसके साम्राज्य की धुरी नहीं रह गया था। ख्2,

कनिष्क साम्राज्य बहुत दिन तक नहीं चला। उसके दो पुत्रों वासिस्का और हविस्का में से केवल दूसरा उसकी मृत्यु के बाद जिन्दा रहा।

तीसरी शताब्दी में कुषाणों की शक्ति घटकर बैक्ट्रिया, काबुल और गांधार तक सीमित रह गई और वे सस्सानिद शासकों के साम्राज्य के अंतर्गत आ गए।

क्षत्रप या सत्रप

यह पद, जो ईरानी है, शकों द्वारा स्थापित दो राजवंशों ने धारण किया जिनको युच-ची आक्रमण के कारण अपने देश से भागना पड़ा।

  1. पहला सौराष्ट्र (काठेवाड़) में स्थापित हुआ था। इस कुल के एक राजकुमार चासथाना ने कुषाणों के महान दिवसों से पूर्व मालवा जीत लिया था और कनिष्क का जागीरदार बन गया था_ उसने उज्जयनी पर राज्य किया, जो भारतीय सभ्यता की केंद्र थी।

  2. दूसरा वंश, जिससे क्षत्रप का नाम खासतौर से जुड़ा हुआ है, परम्परागत रूप से आंध्रों का बैरी था_ इसने महाराष्ट्र देश पर शासन किया जो आधुनिक सूरत व बम्बई के बीच था। इसके बाद की शक रियासत को शतकरनी ने नष्ट किया था जिसकी व्यवस्था पहले से की गई थी। जिस समय उज्जयिनी के क्षत्रप रुद्मान ने आंध्र के राजा को जीता। ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वी और पश्चिमी राज्यों के बीच आदर्शों को लेकर बैर था। पोरखनों जैसे भारत या सेरिंडिया के सभी सीथियों की भांति शकों ने विदेशी होने के बारे में भी बौद्ध धर्म के प्रति सहानुभूति रखी जबकि आंध्र ब्राह्मणवाद के महान समर्थक थे।

गुप्त-युग

तीसरी शताब्दी की घटनाएं इतिहास को मालूम नहीं हैं और हमें कुषाण साम्राज्य के बारे में बहुत कम जानकारी है।

1. पत्र पांडुलिपि में नहीं है।

2. दीमक ने खा लिया था अपनी ओर से लिखा गया।