46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
दिन का प्रकाश 318-19 ई. में वापस लौटता है जब पुराने देश मगध में एक नए राजवंश गुप्त का उत्थान होता है।
गुप्त राजवंश चंद्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन के शक राजवंश के प्रथम महान क्षत्रप को हराकर मालवा, गुजरात और सौराष्ट्र (काठिवाड़) को अपने अधीन कर लिया। अपने राज्य का पश्चिम की ओर विस्तार करने के रूप में उसने पाटलीपुत्र के स्थान पर अयोध्या और कोशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया। उसने लगभग 115 ई. पू. में सिंध का नीचे का भाग और काठिवाड़ जीता, राजपूताना एवं अवध में युद्ध छेड़ा, लेकिन जमुना के किनारे पर स्थित मथुरा को जीता और पाटलीपुत्र तक पहुँच गया।
पुष्यमित्र ने उसे बुरी तरह हराया। बैक्ट्रिया क मसे कम उत्तर में पार्शिया तथा भारत के मध्य एक रुकावट था। इसलिए भारत को पार्शिया से आक्रमण का कम खतरा था। बहरहाल, पार्शिया के एक राजा मिथराडेज़न प्रथम (171-136 ई.) ने 130 के लगभग तक्षशिला देश को कुछ वर्षों के लिए अपने कब्जे में ले लिया।
पार्शिया और बैक्ट्रिया की स्वतंत्रता का अंत
पार्शिया और बैक्ट्रिया की आज़ादी का अंत एक नए आक्रमण से हुआ जो भारत से दूर मंगोलिया की तराई में कबीलों के उथल-पुथल के कारण हुआ।
लगभग 170 ई. पू. हियान्ग-न्यु या हुणों द्वारा गोबी, वर्तमान कांसू से निकाले जाने पर यूच-ची या टोखारी खानाबदोश सीथियों का एक समूह बेतहाशा दूसरे देशों में जाकर बसने लगा जिससे एशिया का समूचा संतुलन बिगड़ गया।
वे शकों पर टूट पड़े, जो ईरानी सीथियन थे और पार्शिया साम्राज्य के उत्तर में रह रहे थे, तथा जजारटेस के उत्तर में उनके चरागाहों में बस गए। वहाँ से हटाए गए शकों ने पार्शिया तथा बैक्ट्रिया का तख्ता पलट दिया और इस प्रकार 140-120 ई. पू. के बीच यूनानी शासन के अंतिम अवशेष को भी मिटा दिया! तत्पश्चात् बू-सुन कबीले द्वारा पराजित होने पर तोखारियों ने ऑक्सस में अपने को स्थापित कर लिया और उसके बाद उन्होंने भारत के द्वार पर पूर्वी ईरान में शकों के पूरे देश पर कब्जा कर लिया। इस प्रवेश द्वार का पता ईसा मसीह के पश्चात् पहली शताब्दी में लगा।
भारत की पराजय का श्रेय कुषाणों को जाता है जिनके राजवंश ने यू-ची कबीलों को संगठित किया और दोनों ने अपने कुटुम्ब-जनों पार्शिया के शकों और पंजाब के लोगों पर अपना शासन स्थापित कर लिया।