3. भारत के इतिहास पर टिप्पणियाँ - Page 62

47

इस वंश का मुख्य राजा कनिष्क 57 ई. पू. और 200 ई. के बीच किसी अनिश्चित तारीख्श को सत्तारूढ़ हुआ।

महल के एक महापौर को साइब्रेनी लिवी पुष्यमित्र नाम से पुकारता था।

सेल्युसिस साम्राज्य पर एन्टीच्योस तृतीय ने 261-246 ई. पू. तक शासन किया और पार्शिया तथा बैक्ट्रिया के दो प्रदेश गवां दिए जो प्रदेश एकदम आज़ाद हो गए। पार्शियन जिन्हें भारतीय पहलवा कहते थे, टुरकोमन के पास मैदान के खानाबदोशों से सम्बन्धित थे, उन्होंने कैस्पियन के दक्षिण-पूर्व देश पर कब्जा कर लिया। बैक्ट्रिया के उत्तर-पूर्व में फैले हिन्दू कुश तथा ऑक्सस के बीच बस गए_ उनके कस्बों की संख्या और सम्पत्ति के बारे में कई दन्तकथाएँ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों कबीलों ने पश्चिम में एन्टीव्योत ओर उसके उत्तराधिकारियों - सैल्यूकस द्वितीय 246-226 ई. पू. और तृतीय (226-223 ई.पू.) को भागने में उनकी कठिनाइयों का लाभ उठाया।

पार्थी-विद्रोह एक स्वाभाविक घटना थी जिसका नेतृत्व आरसेसेस ने किया जो आरसेक्स उस राजवंश का संस्थापक था जिसने पार्शिया पर लगभग 500 वर्ष तक राज्य किया।

यूनान के एक सत्रप की महत्वकांक्षा के कारण बैक्ट्रिया का उत्थान हुआ। डायडोरोस एशिया के मध्य में हेलेनवाद से अलग एक धारा का प्रतिनिधित्व करता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत-ईरान सीमा पर उद्यमशील राष्ट्रों से अशोक साम्राज्य को उसके उत्तराधिकारियों के समय में कमजोर करने में सहायता मिली।

पंजाब के लिए, जो कभी फारस का सूबा था और बाद में सिकन्दर का एक प्रान्त बन गया, हमले का खतरा बढ़ गया क्योंकि अब छोटे लेकिन उपद्रवी राज्य उसके द्वार पर बन गए थे। डियोडोटोस प्रथम और द्वितीय के बाद बैक्ट्रिया का राजा एंर्स्थीजन मास बना जिसने सीरिया के महान एंटीयौचैस से युद्ध किया। लगभग 208 ई. में बैक्ट्रिया की स्वतंत्रता की मान्यता के साथ ही शांति हो गई। लेकिन युद्ध के दौरान सीरिया की कुछ सैनिक टुकडि़यों ने हिन्दूकश पार कर लिया और काबुल घाटी में घुस कर राजा सुभगसैन को नष्ट कर दिया। एन्थीडैमस के पुत्र डेमैटिअस ने अपना साम्राज्य न केवल वर्तमान अफगानिस्तान में बढ़ाया, बल्कि भारत में भी बढ़ाया और भारतीयों के राजा की पदवी धारण कर ली (200-190 ई.पू.)। 190 और 180 ई. पू. के बीच यूनान के पालियोन व अगथोकिल्स नामक साहसी लोगों का तक्षशिला पर राज्य था। करीब 160 से 140 (ई. पू.) के बीच काबुल और बंगाल पर मिलिंद या मिनन्दर नामक एक यूनानी का शासन था, जिसने बौद्ध धर्म के इतिहास में अपना नाम किया।

कुमार गुप्त के अंतिम वर्षों में नए हूण ईरानी लोगों ने साम्राज्य पर आक्रमण कर