4. मनु और शूद्र - Page 64

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मनु और शूद्र

(यह डॉ. अम्बेडकर की हस्तलिखित 31 पृष्ठ की पांडुलिपि है। इस अध्याय को कोई शीर्षक नहीं दिया गया है। इसे भी इसे नहीं किया गया है। शीर्षक प्रस्तावित है - सम्पादक)

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पाठक अब जान गए हैं कि मनु के अनुसार समाज दो मुख्य वर्गों में विभक्त थाः वे जो चार वर्णों में नहीं आते थे और वे जो चार वर्णों में आते थे। पाठक यह भी जानते हैं कि आज के अछूत चारों वर्णों में न आने वाले वर्ग का प्रतिरूप हैं और चार वर्णों में आने वाले लोग चार वर्णों में न आने वाले लोगों से भिन्न थे। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नाम वाले चार विभिन्न वर्गों से बनी एक पूर्ण व्यवस्था थे। हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में समुदाय की अपेक्षा न केवल वर्गों पर ही अधिक बल दिया गया है, अपितु यह वर्गों के बीच और इसलिए व्यक्तियों के बीच असमानता पर आधारित है। दूसरे शब्दों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ग तथा अछूत (अंत्यज) बराबर स्तर के नहीं हैं। ये एक के ऊपर एक हैं। कोई हिन्दू इस कथन का खण्डन नहीं करेगा। हर भारतीय यह जानता है। यदि किसी व्यक्ति को इसमें कोई संदेह हो सकता है तो वह विदेशी ही हो सकता है। लेकिन किसी विदेशी को कोई शंका होगी तो उसकी वह शंका मनु का कानून देखने से दूर हो जाएगी जो हिन्दू समाज का मुख्य निर्माता है और जिसका कानून हिन्दू समाज की नींव है। ऐसे व्यक्ति के लाभ के लिए मनु-स्मृति से ऐसे पाठ उद्धृत करता हूँ जिन से स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू समाज असमानता के सिद्धान्त पर आधारित है।

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यह दावा किया जा सकता है कि मनु ने अपनी स्मृति में जिस असमानता की बात की है उसका ऐतिहासिक महत्त्व है। यह प्राचीन इतिहास है और यह नहीं माना जा सकता कि हिन्दु के वर्तमान आचरण पर इसका कोई प्रभाव पड़ा है। मुझे विश्वास है