52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
पेशवाओं के शासनकाल में जाति के आधार पर अपराधियों को दण्ड दिया जाता था। कठिन परिश्रम और मृत्यु की सजा अक्सर अछूतों को दी जाती थी। ख्1,
पेशवाओं के शासनकाल में ब्राह्मण लिपिकों को अपने सामान पर कतिपय शुल्क नहीं देने पड़ते थे और उनका आयातित अनाज बिना किसी परिवहन-शुल्क के उनके घर पहुँचाया जाता था_ ब्राह्मण जमींदारों को अन्य वर्गों से मिलने वाली लगान अपेक्षा अपनी जमीन का कम दर पर लगान देना पड़ता था। बंगाल में जमीन की लगान हर जाति के मामले में अलग-अलग थी और यदि काश्तकार अछूत होता था तो उसे सबसे अधिक लगान देना पड़ता था। ख्2,
इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि मनु यद्यपि ईसा पूर्व या ईसा के कुछ समय बाद पैदा हुआ था, अभी भी मरा नहीं है और हिन्दू राजाओं के शासनकाल में हिन्दू एवं हिन्दू तथा छूत और अछूत के बीच मनु के कानून के आधार पर न्याय होता था और वह कानून स्पष्ट-रूप से असमानता पर आधारित था।
III
यह मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म है। उसे मानव धर्म कहा जाता है अर्थात् धर्म जो अपनी अन्तर्निहित उत्तमता के कारण सभी मनुष्यों पर, सभी कालों में और सभी स्थानों पर लागू होता है। इस धर्म की भारत के बाहर कोई मान्यता थी, अथवा यह एक अभिशाप था, इस तथ्य की जाँच का काम मैं बंद नहीं करूंगा। यह उल्लेखनीय है कि यह मानव धर्म इस सिद्धांत पर आधारित है कि ब्राह्मण को सभी अधिकार प्रापत हैं और शूद्रों को मनुष्य होने का भी अधिकार प्राप्त नहीं है, ब्राह्मण हर चीज में सभी व्यक्तियों से मात्र इसलिए ऊपर होगा कि उसका जन्म उच्च-जाति में हुआ है एवं शूद्र सभी लोगों से नीचे होगा, और उसे कुछ नहीं मिलेगा चाहे वह कितना ही योग्य हो। यह मानव धम्र बहुत ही निर्लज्ज और हास्यास्पद है और बेहतर यह होगा कि इसे उलट-पुलट दिया जाए। जहाँ तक मैं जानता हूँ इस सम्बन्ध में डॉ. आर.पी. परांजपे ने जो एक महान शिक्षाशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज-सुधारक थे, सबसे अधिक सराहनीय प्रयास किया है और मुझे उनके शब्दों को पूर्णतया उद्धृत करने में कोई खेद नहीं है।
1. भट्टाचार्या पृष्ठ-259
2. मद्रास जनगणना 1891 पृष्ठ-299