4. मनु और शूद्र - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

भविष्य की झांकी ख्1,

यह रचना गैर-ब्राह्मण दलों के विरुद्ध लिखी गई थी जो उस समय बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सी में तथा मध्य-प्रान्तों में सत्ता में थे। गैर-ब्राह्मण दल इस उद्देश्य से स्थापित किए गए थे कि राज्य-सेवा में किसी एक समुदाय का एकाधिकार न हो। ब्राह्मणों का भारत के सभी प्रान्तों की राज्य-सेवाओं में और राज्य के सभी विभागों में प्रायः पूरा एकाधि कार था। इसलिए गैर-ब्राह्मण दलों ने साम्प्रदायिक अनुपात का सिद्धांत बनाया जिसके अनुसार सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्तियायाँ करने के मामले में न्यूनतम योग्यताएं होने पर ब्राह्मण उम्मीदवारो की तुलना में गैर-ब्राह्मण समुदायों के उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मेरे विचार से इस सिद्धान्त में कोई बुराई नहीं थी। यह निश्चित रूप से गलत था कि देश का प्रशासन एक समुदाय के हाथों में हो चाहे वह समुदाय कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो।

गैर-ब्राह्मण पार्टी का विचार था कि अच्छी सरकार कार्यरूप में सक्षम सरकार से बेहतर होने का सिद्धान्त केवल विधानसभाओं और कार्यपालिका के गठन के मामले में ही लागू नहीं किया जाना चिहए, अपितु इसे प्रशासन के क्षेत्र में भी लागू होना चाहिए। प्रशासन के माध्यम से ही राज्य आम जनता के सम्पर्क में सीधे आती है। कोई प्रशासन अच्छा नहीं हो सकता यदि वह सहृदय नहीं है। कोई प्रशासन सहृदय नहीं होगा यदि उसमें केवल ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण जो आम जनता से अपने को उच्च समझता है, दूसरों को निम्न-जाति और शूद्र समझकर उनकी उपेक्षा करता है, उनकी आकांक्षाओं का विरोध करता है, सहज-ज्ञान से वह अपने समुदाय का पक्ष लेता है, आम लोगों में कोई दिलचस्पी नहीं लेता है और भ्रष्ट है, कैसे अच्छा प्रशासक हो सकता है। वह भारत की आम-जनता के लिए उतना ही पराया है जितना कि कोई विदेशी। इसके विरुद्ध ब्राह्मण केवल कार्य क्षमता पर बल देते रहे हैं। वे जानते हैं कि यह एक ताश का पत्ता है जिसे शिक्षा की दृष्टि से आगे होने के कारण वे सफलतापूर्वक खेल सकते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यदि कार्य-क्षमता ही एकमात्र मापदण्ड है तो जिस तरह और जिस हद तक उन्होंने राज्य-सेवा पर एकाधिकार कर लिया है, संभवतया न कर पाते। यदि कार्यक्षमता ही एकमात्र मानदण्ड है तो भारत के ब्राह्मणों के बजाए अंग्रेजी, फ्रांसीसियों, जर्मनी के लोगों और तुर्कों को निवेजित करने में क्या बुराई थी। जो भी हो, गैर-ब्राह्मण पार्टियों ने कार्यक्षमता के महत्त्व को इन्कार कर दिया और इस बात पर बल दिया कि सार्वजनिक

1. गुजराती पंच, मई 1921 से दुबारा छापना (पांडुलिपि में छपा नहीं है-सम्पादक)