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सेवाओं में साम्प्रदायिक अनुपात का सिद्धांत लागू किया जाए ताकि प्रशासन में सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अवसर मिले और इस प्रकार एक अच्छी सरकार बने। इस सिद्धान्त को लागू करने में गैर-ब्राह्मण पार्टियों ने प्रशासन में ब्राह्मणों के प्रभाव को कम करने की उत्सुकता में वह प्रायः भूल जाते थे कि लोक-सेवाओं में ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों में संतुलन लाने में न्यूनतम कार्यक्षमता का नियम एक बाधा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने अपने मार्गदर्शन के लिए जो नियम अपनाया, वह आम लोगों के हित में प्रशंसनीय नहीं था।
निस्संदेह इस नीति से कई ब्राह्मण काफी उत्तेजित हुए। डॉ. परांजपे की यह रचना गैर-ब्राह्मण दल की नीति पर एक बहुत ही उत्तम व्यंग्य है। यह गैर-ब्राह्मण दल के सिद्धान्त का अद्वितीय व्यंग्य-चित्र है और मुझे मालूम है, बहुत से गैर-ब्राह्मण नेता इसके प्रकाशित होने पर क्रोधोन्मत ही नहीं हुए बल्कि हक्के-बक्के रह गए। डॉ. परांजपे से मेरी शिकायत यह है कि उन्होंने इसके विनोद को नहीं समझा। गैर-ब्राह्मण पार्टी कुछ नया नहीं कर रही थी। वह केवल मनुस्मृति को उल्टा पलट रही थी। वह मेजों को उलटा कर रही थी। गैर -ब्राह्मण पार्टी कुछ नया नहीं कर रही थी। वह ब्राह्मणों को उस स्थिति में ला रही थी जिसमें मनु ने शूद्रों को रखा था। क्या मनु ने केवल ब्राह्मणों को विशेषाधिकार इसलिए दिया था क्योंकि वह स्वयं ब्राह्मण था। क्या मनु ने केवल शूद्रों को हर प्रकार के अधिकारों से वंचित नहीं रखा, यद्यपि कि वह इसका हकदार था। यदि अब शूद्र को शूद्र होने के नाते कोई विशेष अधिकार दे दिए जाएं तो क्या उसके विरुद्ध कोई शिकायत हो सकती है? यह हास्यास्पद लगेगा लेकिन इस नियम का पूर्वोदाहरण है और उसका एक पूर्वोदाहरण मनुस्मृति ही है। और गैर-ब्राह्मण पार्टी पर कौन पत्थर फैंक सकता है? ब्राह्मण फैंक सकते हैं यदि उन्होंने कोई पाप नहीं किया है। लेकिन क्या लेखक और पुजारी, मनुस्मृति के समर्थक, यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने कोई पाप नहीं किया है? डॉ. परांजपे की रचना मानव धर्म में निहित असमानता का एक बहुत ही उत्तम निन्दा-प्रस्ताव है। इससे बड़े अनुपम ढंग से स्पष्ट हो जाता है कि एक ब्राह्मण को एक शूद्र की स्थिति में रख दिया जाए तो वह कैसा महसूस करेगा।
असमानता हिन्दुओं में ही नहीं है। यह अन्य जगह भी पाई जाती थी और समाज को उच्च व नीच, स्वतन्त्र और दास वर्गों में विभाजित करने के लिए जिम्मेदार थी।
(पांडुलिपि में अधूरा छोड़ दिया गया - सम्पादक)