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सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना

(ये डॉ. अम्बेडकर की पांडुलिपि के चार हस्तलिखित पृष्ठ हैं और इनके बीच-बीच में टाइप हुए धर्म ग्रंथों के उद्धरण हैं। पहले पृष्ठ पर 56 अंक अंकित है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि इससे पहले का भाग उपलब्ध नहीं है। बाद का भाग भी गायब है। शीर्षक सुझाया गया है - संपादक)

XII -100ः फ्सेनाओं पर कमान, राजसी प्रभुत्व, सजा देने की शक्ति और सभी राष्ट्रों पर प्रभुसत्ता सम्पन्न प्रभुतव का अधिकारी केवल वही हो सकता है जो वेद-शास्त्र को पूरी तरह समझता है। (अर्थात् जो ब्राह्मण है)- मनुस्मृति

स्थापित व्यवस्था को बनाए रखने तथा सुरक्षित रखने का दूसरा तरीका पहले से बिल्कुल भिन्न है। वास्तव में यह हिन्दू सामाजिक व्यवस्था का एक विशेष अंग है।

उग्र हमलों से सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करने के लिए तीन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। क्रांति का प्रादुर्भाव तीन कारणों से होता है। (1) बुरी भावनाओं का होना, (2) यह जानने की क्षमता का होना कि कोई गलतियों का शिकार है, तथा (3) हथियारों का मिलना। दूसरा विचार यह है कि एक विद्रोह से निपटने के दो तरीके हैं। एक यह कि विद्रोह को होने से रोकना और दूसरा यह है कि विद्रोह होने पर उसे दबाना। तीसरा विचार है कि क्या विद्रोह को रोकना संभव होगा या क्या विद्रोह को दबाना ही एकमात्र रास्ता है, यह उन नियमों पर निर्भर करेगा जो विद्रोह की पूर्वापेक्षाओं को प्रभावित करते हैं।

यदि सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि उसमें किसी को उन्नति करने, शिक्षा प्राप्त करने और हथियारों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है तो सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह को रोका जा सकता है। दूसरी ओर, यदि सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि वह उन्नति करने, शिक्षा प्राप्त करने की आज्ञा देती है और हथियारों के प्रयोग करने का अवसर देती है तो जिन लोगों के प्रति अन्याय होता है उनके द्वारा विद्रोह को नहीं रोका जा सकता। इसका एकमात्र उपाय यह है कि बलप्रयोग और हिंसा द्वारा विद्रोह का