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राजनीतिक दमन की समस्याऽ
भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को मंदगति से एवं धीरे-धीरे लागू किया गया है। इसका आरंभ 1892 में हुआ जब विधानसभाओं के विधान में लोक-प्रतिनिधि त्व के सिद्धान्त को लगा किया गया। इसे 1909 में विस्तारित किया गया। 1909 में लागू लोक-प्रतिनिधित्व में दो कमियाँ थीं। पहली कमी यह थी कि मताधिकार बहुत ऊँचे लोगों को प्राप्त था। यह इतने ऊँचे लोगों को प्राप्त था कि बड़ी संख्या में लोग इससे वंचित थे। जिन लोगों को यह अधिकार प्राप्त था वे हिन्दू और मुसलमान अभिजात गर्व के लोग थे। दूसरी कमी यह थी कि लोक-प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त विधानसभाओं तक सीमित था। यह कार्यपालिका के मामले में लागू नहीं होता था। कार्यपालिका का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा। विधानमंडल इसे न तो बना सकता था और न ही समाप्त कर सकता था। इसे फिर 1919 में लिया गया। बड़ी विचित्र बात है कि 1919 में लोक-प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त कार्यपालिका पर लागू करते समय इसे विधानसभा के अनुपात में नहीं लागू किया गया। इसका कारण यह था कि भारत में राजनैतिक आंदोलन का नेतृत्व अधिकतर उच्च वर्गों के लोग कर रहे थे। उनकी दिलचस्पी मताधिकार का विस्तार करने की अपेक्षा कार्यपालिका की शक्ति में अधिक रही है। यह स्वाभाविक है। उनको कार्यपालिका की शक्ति से फायदा था जबकि आम जनता को माताधिकार मिलने से फायदा था।
उच्च वर्गों की अँग्रेज अधिकारियों तक पहुंच होने के कारण उन्होंने उन पर कार्यपालिका शक्ति के लिए दबाव डाला और मताधिकार प्राप्त किए बिना इसे प्राप्त करने में सफल हो गए।
ऽ यह डॉ. अम्बेडकर की छह पृष्ठों की हस्तलिखित पांडुलिपि है और यह हिन्दू सामाजिक व्यवस्था
योजना का तेरहवाँ अध्याय है। अंतिम वाक्य से ऐसा प्रतीत होता है कि इस अध्याय को अधूरा छोड़
दिया गया है - संपादक।