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मताधिकार निस्संदेह 1909 में निश्चित समय के बहुत बाद दिया गया। लेकिन अछूतों को यह अधिकार नहीं दिया गया। निस्संदेह वे इतने गरीब हैं कि केवल व्यस्क मताधिकार का प्रावधान होने से ही अछूतों के नाम मतदाता सूचियों में आ सकते हैं।
भारत सरकार बहुत बेचैन हुई। उसका इसमें ज्यादा दखल नहीं था। लेकिन भारत सरकार ने अछूतों को चुनाव में मत देने का अधिकार दिए बिना उच्च-जातीय हिन्दुओं के राजनैतिक प्रभुत्व में उनको रखने के बारे में जरूर उत्सुकता व्यक्त की। दिनांक 19 मार्च 1919 के अपने पत्र में भारत सरकार ने निम्नलिखित टिप्पणी कीः
(i) सांप्रदायिक निर्णय नामक ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित (उद्धरण) योजना
के अंतर्गत 1935 में स्थिति में परिवर्तन आया।
अछूतों को विभेदी मताधिकार दिया गया, जिसके अंतर्गत 10 प्रतिशत अछूत
मतदान कर सकते थे।
(ii) अछूतों को विभेदी मताधिकार ही नहीं दिया गया अपितु उनके लिए प्रांतीय
और केंद्रीय विधानमंडल में कुछ स्थान भी आरक्षित किए गए।
(iii) आरक्षित स्थानों को अछूत समुदाय के मतदाताओं के पृथक निर्वाचक-मंडलों
द्वारा भरा जाना था।
(iv) पृथक निर्वाचन-मंडलों में मत देने का अधिकार प्राप्त होने के अलावा अछूत
आम चुनावों में उन स्थानों के लिए भी दूसरा या अतिरिक्त मत दे सकते
थे, जिन पर अछूतों को छोड़कर अन्य हिन्दू खड़े हो सकते थे।
गांधी महोदय ने, जो अछूतों को अलग प्रतिनिधित्व देने का विरोध कर रहे थे, ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया और धमकी दी कि यदि इन रियायतों को वापस नहीं लिया गया तो वह आमरण अनशन करेंगे। गांधी महोदय मुख्य रूप से पृथक निर्वाचन-मंडलों का विरोध कर रहे थे और ब्रिटिश सरकार ने तब तक अपने प्रस्ताव वापस लेने से इंकार कर दिया जब तक कि अछूतों और हिन्दुओं में समझौता नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति में गांधी महोदय ने अपना अनशन आरम्भ कर दिया। अंततः, सितम्बर 1932 में हिन्दुओं और अछूतों के बीच एक समझौता हुआ। वह समझौता पूना समझौता के नाम से विख्यात है। इसकी शर्तें निम्नलिखित हैंः
1. 25 सितम्बर, 1932 को हस्ताक्षरित।