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.... और उद्योग में बिल्कुल यही पद्धति विभिन्न रूप से लागू थी। मालिक पट्टठ्ठे पर बैंक दे सकता था, या जहाज का इस्तेमाल करने का काम दे सकता था, इसके लिए दास एक निश्चित धनराशि देता था या दास को कमीशन दिया जाता था।य् ख्1,
फ्एक दास की आमदनी कानूनी तौर पर उसकी अपनी संपत्ति थी। इस बचत का विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जा सकता था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बहुत से मामलों में यह धन, भोजन और सुख-सुविधाओं पर खर्च किया जाता था ....लेकिन इस राशि को यों ही अर्जित की जाने वाली और बेकार में खर्च की जाने वाली मोटी बचतें नहीं समझा जाना चाहिए। जो दास अपने मालिक को उसके काम में मुनाफा कर देता था, उसे खुद भी मुनाफा होता था और उसे यह समझ थी कि किस काम में पैसा लगाने से उसे अधिकतम कमाई हो सकती थी। अक्सर वह अपना पैसा अपने मालिक के काम में लगाता था या उन उद्यमों में लगाता था जिनका इससे कोई संबंध नहीं होता था। वह अपने मालिक के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित कर सकता था, जिससे वह बिल्कुल अलग समझा जाने लगा था, या किसी तीसरे व्यक्ति से इकरारनामा कर सकता था। अपनी संपत्ति और हितों की देखभाल के लिए वह एजेंट भी रख सकता था। अतः उसकी संपत्ति में मात्र जमीन, मकान, दुकान ही नहीं आते थे अपितु उन पर अधिकार और दावे भी आते थे।
फ्दास कई प्रकार के व्यापारिक काम करते हैं_ उनमें से कुछ दुकानदार हैं जो हर प्रकार का खाद्य, रोटी, माँस, नमक, मछली, शराब, सब्जी, सेम फली, औपाइन-बीज, शहद, दही, सुखाया हुआ जानवर के कूल्हे का माँस, बत्तखें और ताजी मछली बेचते हैं और दूसरे कपड़े, चप्पल, जूती, गाऊन और लबादा का लेनदेन करते हैं। रोम में वे अपना व्यापार पास के सर्कस मक्जीमम में या पोर्टीकस ट्रीजमीनस या एस्कीलाइन मार्किट या ग्रेट मार्ट में (कालोनियल पहाड़ी) या सुबुर्रा में करते हैं।.... ख्2,
दास सचिव और दलाल अपने मालिकों के लिए जितना काम करते थे, यह बात पोम्पी में सेसीलियास जकुण्डस के घर में मिली रसीदों से पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। ख्3,
राज्य के पास दास होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी_ युद्ध अंततः राज्य का मामला था और जो बंदी बनाए जाते थे वे राज्य की संपत्ति होते थे। आश्चर्य की बात यह है कि सरकारी दासों का साम्राज्य में अनोखा प्रयोग किया जाता था और सामाजिक रूप से उनकी स्थिति असाधारण थी.....।य्
1. रोम साम्राज्य में दासता, पृ. 101-102 ।
2. वही, पृ. 105 ।
3. रोम साम्राज्य में दासता, पृ. 106 ।