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लेकिन संयुक्त राज्य अमरीका में ऐसा हुआ है। रोम के दास और अमरीका के नीग्रो की वास्तविक हालत अछूतों की आज की हालत से जानबूझकर इसलिए तुलना की गई है क्योंकि अछूतों के लिए आज का समय स्वर्णकाल माना जाता है। लेकिन अछूतों की यहाँ तक कि आज की स्थिति की तुलना दासों की उस समय की हालत से, जिसे इतिहासकार बर्बर कहते हैं, करें तो भी इनकी हालत अपेक्षाकृत बहुत बुरी है। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि अछूतों की हालत दासों की हालत से काफी बदतर रही है। निस्संदेह इसका अर्थ यह है कि मानव की उन्नति के लिए दासता की अपेक्षा अस्पृश्यता अधिक हानिकारक है। इसमें बड़ी विडम्बना है। दास जो कानून की दृष्टि से अछूतों से बदतर थे वास्तव में अछूतों से बेहतर थे और अछूत जो कानून की दृष्टि से दासों से अच्छे थे वास्तव में दासों से बदतर थे। इस विडम्बना का क्या स्पष्टीकरण है? सभी प्रश्नों का एक प्रश्न यह है कि ऐसी क्या चीज है जिसकी सहायता से दासों ने कानूनी तौर पर आजादी पर लगी पाबंदी की जंजीरों को तोड़ दिया और उन्हें फूलने-फलने दिया? ऐसी क्या चीज है जिसने अछूतों को कानून द्वारा दी गई स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया और उसकी जीवन की शक्ति को दुर्बल कर दिया तथा उसकी उन्नति को रोक दिया।
इस विडम्बना का स्पष्टीकरण बड़ा सरल है। यह आसानी से समझा जा सकता है यदि कोई कानून एवं जनमत के बीच के सम्बन्ध को ध्यान में रखें। कानून और जनमत दो ऐसी शक्तियाँ हैं जो मनुष्य के आचरण को प्रभावित करती हैं। वे एक-दूसरे पर क्रिया और प्रतिक्रिया करती हैं। कई बार कानून जनमत से आगे निकल जाता है और उस पर नियंत्रण करता है और उसे उस रास्ते पर चलाता है जिसे वह सही समझता है। कई बार जनमत कानून से आगे निकल जाता है। यह कानून की कठोरता को दुरुस्त करता है ओर उसे नम्र बनाता है। इस तरह के उदाहरण भी हैं कि कानून और जनमत की राय एक दूसरे के विरुद्ध होती है और जनमत दोनों शक्तियों में अधिक ताकतवर होने पर कानून द्वारा निर्धारित की अवहेलना करता है या उसे ठुकरा देता है। चाहे वाणिज्य और उद्योग की सुविधा से उत्पन्न विवशता या दासों का सबसे अधिक और बहुत ही लाभप्रद उपयोग करने की स्वार्थ की भावना या मानवता के विचार इसके कारण रहे हों, रोम या संयुक्त राज्य अमरीका में दास की स्थिति के बारे में जनमत और कानून में कभी मेल नहीं रहा। दन दोनों स्थानों पर दास की दृष्टि में कानूनी व्यक्ति नहीं था। लेकिन दोनों स्थानों पर वह एक मानव के अर्थ में समाज की दृष्टि में एक व्यक्ति रहा। दूसरे शब्दों में कानून ने दास को जो व्यक्तित्व नहीं दिया वह समाज ने उसे दिया। इस दृष्टि से दासता और छुआछूत में बहुत बड़ा अंतर है। अछूतों के मामले में बिल्कुल उल्टा हुआ है। कानून ने अछूतों को जो व्यक्तित्व दिया, वह समाज ने नहीं दिया। दास के मामले में कानूनी-तौर पर उसे एक व्यक्ति के रूप में मान्यता न दिए जाने पर कानून उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचा सका क्योंकि समाज ने उसे आवश्यकता से अधिक मान्यता दी। अछूतों के मामले