9. अधिक बदतर क्या है-दासता या छुआछुत? - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

में कानून उसे एक व्यक्ति के रूप में मान्यता देकर भी उसकी कोई भलाई नहीं कर सका क्योंकि हिन्दू समाज उस मान्यता को समाप्त करने पर तुला हुआ है। दास का एक व्यक्तित्व था जिसका महत्त्व होता था कानून चाहे जो भी रहा हो। लेकिन कानून होने पर भी एक अछूत का कोई व्यक्तित्व नहीं है। यह अंतर आधारभूत है। विडम्बना का मात्र यही स्पष्टीकरण हो सकता है - कानूनी गुलामी होने के बावजूद दास का सामाजिक उत्थान और कानूनी स्वतंत्रता होने पर भी अछूतों की सामाजिक अधोगति।

जिन लोगों ने दासता की निंदा की है वे निस्संदेह इस तथ्य को ध्यान में रखना भूल गए हैं कि दासता, व्यापार, शिल्प अथव कला में अनिवार्यतः एक तरह की प्रशिक्षता थी। स्वतंत्रता की हानि की क्षतिपूर्ति के अभाव में पक्की दासता निश्चित रूप से यह निंदनीय है। लेकिन एक व्यक्ति को दास बनाना और उसे प्रशिक्षित करना स्वाधीन होने पर भी बर्बरता की स्थिति में होने से बेहतर है। दासता का अर्थ सभ्यता के बदले अर्द्ध-बर्बरता प्राप्त करना था, यह एक अत्यधिक अस्पष्ट उपहार था परन्तु बिल्कुल सच था। सभ्य जीवन के लिए सभी अवसरों का पूरी तरह उपयोग निस्संदेह स्वतंत्र वातावरण में ही किया जा सकता था लेकिन दासता एक प्रशिक्षणुता थी, अथवा प्रो. माइरेस के शब्दों में फ्एक उच्च संस्कृति में एक पदार्पणय्।

दासता के बारे में यह विचार बहुत ही सही है। इस प्रशिक्षण, संस्कृति में इस पदार्पण से निस्संदेह दास को काफी लाभ था। इसी प्रकार अपने दास को प्रशिक्षित करने के लिए, उसे संस्कृति में लेने के लिए उसके मालिक को भारी मूल्य चुकाना पड़ता था। फ्दासता से पूर्व शि्िक्षत या प्रशिक्षित दासों की पूर्ति बहुत कम होती होगी। इसका विकल्प यह था कि युवा-अवस्था में ही दासों को घरेलू काम में लगे रहने के साथ ही कारीगरी में प्रशिक्षित किया जाए जैसा कि कुछ हद तक उदाहरण के तौर पर कैटो, दि एल्डर द्वारा साम्राज्य से पहले किया गया था। उसका मालिक तथा उसके कर्मचारी उसे प्रशिक्षण देते थे। वास्तव में अमीर घराने में इस प्रयोजन के लिए विशेष अध्यापक रहते थे। यह प्रशिक्षण कई तरह का होता था जैसे उद्योग, व्यापार, कला और साहित्यय्।

प्रश्न यह है कि दास का उच्च संस्कृति में सूत्रपात क्यों किया जाता था और अछूत को इस तरह के सूत्रपात का अवसर क्यों नहीं मिला? प्रश्न बहुत संगत है और मैंने यह इसलिए उठाया है कि इसके उत्तर से इस निष्कर्ष को बल मिलेगा कि अस्पृश्यता दासता से बदतर है और यही कारण है कि दास का अपना एक व्यक्तित्व था लेकिन अछूत का कोई व्यक्तित्व नहीं है।

मालिक दास को प्रशि्िक्षत करने और उसे श्रम के उत्तम तरीकों एवं संस्कृति में सूत्रपात की शिक्षा देने के लिए इतना कष्ट इसलिए उठाता था क्योंकि उसे इससे लाभ होता था। एक प्रशिक्षित दास एक वस्तु के रूप में एक अप्रशिक्षित दास से अधिक