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मूल्यवान था। उसे यदि बेचा जाता तो अधिक पैसे मिलते और यदि उसे भाड़े पर दिया जाता तो अधिक मजदूरी मिलती। अतः अपने दास को प्रशिक्षित करना मालिक के लिए पूँजीनिवेश था। लेकिन दास के उत्थान और अछूत की अवनति का यही कारण नहीं है। मान लीजिए कि रोम के समाज को दास के हाथों से सब्जी, दूध, मक्खन, पानी या शराब खरीदने पर आपत्ति थी, मान लीजिए कि रोम के समाज को दास के द्वारा उकनो छूने पर, उनको घरों में प्रवेश करने पर, कारों आदि में उनके साथ यात्रा करने पर आपत्ति थी तो क्या मालिक अपने दास को प्रशिक्षित कर पाता, उसे अर्द्ध-बर्बरता की स्थिति से निकालकर उसे सु-संस्कृत मानव बना पाता? बिल्कुल नहीं। मालिक दास को इसलिए प्रशिक्षित कर सका और उसका उत्थान कर सका कि वह उसे अछूत नहीं समझता था। अतः हम पुनः उसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दास इसलिए सुरक्षित रह सका क्योंकि समाज उसके व्यक्तित्व को मान्यता देता था और अछूत का इसलिए विनाश हुआ है कि हिन्दू समाज उसके व्यक्तित्व को मान्यता नहीं देता था, उसे इन्सानों के साथ मिलने-जुलने और उनके साथ लेन-देन करने के योग्य नहीं समझता था।
रोम में क्योंकि एक दास था, इसलिए वह एक इंसान से कम नहीं था, वह इंसानों से मेल-जोल रखने योग्य था हालाँकि वह बंधन में था इसकी पुष्टि दासों के प्रति रोम के धर्म की प्रवृत्ति से हो जाती है। कहा गया है किः-
फ्रोम का धर्म कभी दास-विरोधी नहीं रहा। इसने उसके लिए मंदिरो के द्वार कभी बंद नहीं किए_ इसने अपने त्यौहारों से उनको निकाला नहीं। यदि दासों को कतिपय समारोहों से अलग रखा गया, तो स्वतंत्र पुरुषों और महिलाओं के मामले में भी यही बात कही जा सकती है जिनको बोनो दीया, बैस्टा और सैरेस के धार्मिक-अनुष्ठानों में, महिलाओं को आरा मैक्नीमा में हरकुलीस के धार्मिक-अनुष्ठानों में शामिल नहीं किया गया। जिन दिनों रोम के पुराने देवताओं की कुछ गिनती थी, उस समय दास को अनौपचारिक रूप से परिवार का सदस्य माना जाने लगा था और वह यह समझ सकता था कि उसे परिवार के देवताओं की सुरक्षा प्राप्त है। ....आगस्टस ने आदेश दिया कि स्वतंत्र की गई स्त्रियाँ बेस्टा की पुजारिन बनने के लिए पात्र होनी चाहिए। कानून में इस बात पर बल दिया गया कि एक दास की कब्र को पवित्र माना जाए और रोम की पौराणिक परंपरा में उसकी आत्मा के लिए किसी विशेष स्वर्ग या खास नरक का प्रावधान नहीं था। नवयुवक इस बात को मानता है कि दास और उसके मालिक के शरीर और आत्मा में कोई अंतर नहीं था......।य्
कानून में दास
एक व्यक्ति के तौर पर वह बेदाग था। रोम में एक दास और समाज के अन्य लोगों