9. अधिक बदतर क्या है-दासता या छुआछुत? - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

में सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से कोई अंतर नहीं था। बाहरी रूप-रंग की दृष्टि से उसमें और एक आजाद व्यक्ति में कोई अंतर नहीं था_ उसके रंग या कपड़ों से उसकी स्थिति का पता नहीं चलता था_ वह वही खेल देखता था जो आजाद लोग देखते थे, वह नगरपालिका के कस्बों के जीवन में हाथ बँटाता था, राज्य-सेवा में नियुक्त था, सभी स्वतंत्र लोगों की तरह व्यापार और वाणिज्य का काम करता था। एक व्यक्ति के लिए बाहरी चीजों में समानता प्रायः कानून के सभी अधिकारों की वास्तविक पहचान से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। एक दास और स्वतंत्र आदमी के बीच प्रायः कोई सामाजिक बाधा नहीं थी। एक दास और मुक्त किए हुए दास के बीच विवाह एक आम बात थी। दास होने से कोई व्यक्ति समाज में कलंक का टीका नहीं बन जाता था। वह स्पर्शग्राह्य और आदरणीय था।

यह दिखाने के लिए बहुत कुछ कहा जा चुका है कि छुआछूत दासता से बदतर है। इसकी तुलना केवल मध्य-युग के यहूदियों से ही की जा सकती है। यहूदियों की निम्न-स्थिति कुछ हद तक अछूतों की हालत से मिलती-जुलती है। लेकिन इसके बारे में यह कहा जा सकता है। पहले तो यह कि यहूदियों के साथ जिस आधार पर भेदभाव किया जाता था वह बिल्कुल बोधगम्य था यद्यपि उचित नहीं था। यह धर्म के मामले में यहूदियों की कट्टठ्ठरता पर आधारित था। यहूदी गैर-यहूदियों के धर्म को स्वीकार नहीं करता था और उसकी इसी कट्टठ्ठरता के कारण उसे दंडित होना पड़ा। उसने जैसे ही अपनी कट्टठ्ठरता को त्याग दिया वह अपनी निर्योग्यताओं से मुक्त हो गया। लेकिन अछूत के मामले में ऐसी बात नहीं है। उसकी निर्योग्यताओं का कारण यह नहीं है कि वह प्रोटेस्टेट या रूढि़वादी नहीं है। यहूदियों की इन निर्योग्यताओं के बारे में दूसरी बात यह कही जाती है कि वे चाहते थे कि उनका व्यक्तित्व गैर-यहूदियों में पूरी तरह आत्मसात हो जाए। यह बात विचित्र प्रतीत हो सकती है लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बात सिद्ध हो जाती है। इस संदर्भ में इतिहास में उद्धृत दो घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है जो यहूदियों की प्रवृत्ति का प्रतीक हैं। पहली घटना का नेपोलियन के साम्राज्य से संबंध है। जब फ्रांस की राष्ट्रीय विधानसभा यहूदियों के लिए मानवाधिकारों की घोषणा करने के लिए सहमत हो गई तो आलसेस के गिण्ड व्यापारियों और धार्मिक प्रतिक्रियावादियों ने यहूदियों का प्रश्न पुनः उठाया। नेपोलियन ने यह प्रश्न विचार के लिए यहूदियों को ही देने का निश्चय किया।

फ्उसने जर्मनी, फ्रांस और इटली के श्रेष्ठ यहूदी व्यक्तियों की एक सभा इस बात का पता लगाने के लिए बुलाई कि क्या यहूदी धर्म के सिद्धान्त नागरिकता की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं क्योंकि वह यहूदी समुदाय को प्रमुख जनसमुदाय में मिला देना चाहता था। 111 प्रतिनिधियों की सभा की बैठक 25 जुलाई, 1806 को पेरिस के टाउन हॉल में हुई जिसे मुख्य रूप से यहूदियों की देशभक्ति की संभावना, यहूदियों और गैर-यहूदियों