9. अधिक बदतर क्या है-दासता या छुआछुत? - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

कर्त्तव्य था कि वह उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा करेगा। दास को अपने लिए

खाने, कपड़े या मकान की चिंता नहीं रहती थी। इन चीजों का प्रबंध करना उसके मालिक की जिम्मेदारी थी। निस्संदेह, दास मालिक के लिए बोझ नहीं होता था क्योंकि वह अपेक्षाकृत अधिक कमाता था। लेकिन हर स्वतंत्र व्यक्ति खाने-पीने और रहने की व्यवस्था नहीं कर सकता था यह बात सभी कमा कर खाने वाले समझते हैं। जो मेहनत करने के लिए तत्पर रहते हैं उनको भी हमेशा काम नहीं मिलता लेकिन एक मजदूर इस नियम से नहीं बच सकता जिसके अनुसार यदि वह काम नहीं करेगा तों उसे रोटी नहीं मिलेगी। काम नहीं तो रोटी नहीं का यह नियम, व्यापार में उतार-चढ़ाव, तेजी और मंदी आदि ऐसी चीजें हैं जिनका सभी स्वतंत्र मजदूरों को सामना करना पड़ता है। लेकिन दास पर इन चीजों का प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह इन बातों से आजाद होता है। तेजी हो या मंदी उसे वही खाना - संभावतः मालिक जैसा ही खाना मिलता है। छुआछूत दासता से बदतर है क्योंकि दास को आजीविका की जो सुरक्षा उपलब्ध है वह सुरक्षा अछूत को उपलब्ध नहीं है। अछूत को भोजन, मकान और कपड़ा देने के लिए कोई जिम्मेवार नहीं है। इस दृष्टि से छुआछूत दासता से न केवल बदतर है बल्कि यह उसकी तुलना में सकारात्मक रूप से पीड़ादायक है। दासता के मामले में दास के लिए काम ढूंढना मालिक की जिम्मेदारी होती है। स्वतंत्र श्रम-प्रणाली में काम पाने के लिए कारीगरों को एक-दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है। काम के लिए इस छीना-झपटी में एक अछूत के साथ कितना न्याय हो सकता है? संक्षेप में, इस होड़ में हवा हमेशा उसके प्रतिकूल जाती है, उस पर लगे सामाजिक कलंक के कारण उसे सबसे अंत में काम मिलता है और सबसे पहले निकाला जाता है। दासता की तुलना में छुआछूत कू्रर है क्योंकि छुआछूत के मामले में आजीविका का कोई साधन न होने पर भी एक अछूत को अपना निर्वाह स्वयं करना पड़ता है। एक और दृष्टि से भी छुआछूत दासता से बदतर है। दास संपत्ति था और इसलिए एक स्वतंत्र व्यक्ति की तुलना में उसे एक लाभ था। बहुत उपयोगी होने के कारण मालिक अपने हित में दास के स्वास्थ्य और सुख-सुविधा का काफी ध्यान रखता था। रोम में दासों को कभी भी दलदल व मलेरिया वाली भूमि पर काम में नहीं लगाया जाता था। ऐसे स्थानों पर केवल स्वतंत्र लोगों को काम दिया जाता था। काटो ने रोम के किसानों को दलदल व मलेरिया की भूमि पर दासों को काम न देने की सलाह दी है। यह बात विचित्र लगती है। लेकिन इस पर थोड़ा विचार करने से पता चलेगा कि यह बिल्कुल स्वभाविक था। दास एक उपयोगी संपत्ति था और इस प्रकार एक समझदार आदमी जानता था कि उसे मलेरिया न होने में उसका हित है। एक स्वतंत्र व्यक्ति का इतना ध्यान नहीं रखा जाता है क्योंकि वह एक उपयोगी संपत्ति नहीं है। इस विचारधारा से दास को बहुत लाभ हुआ। उसकी जितनी देखभाल होती थी उतनी किसी की नहीं होती थी। अछूतों का इस तरह का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। उसकी उपेक्षा की जाती है और भूख से मरने दिया जाता है।