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मैं यही कहना चाहता था। जहाँ तक दिल्ली और अन्य स्थानों का संबंध है, और इस कारण इसे सुभिन्न स्तर दिया जाए। मैं इस प्रश्न पर लाला देशबंधु गुप्त के साथ हूँ, परंतु छोटे-छोटे क्षेत्रों जैसे अजमेर-मेवाड़ कुर्ग, पंटी पियन्नोदा आदि को प्रांतों में मिला दिया जाना चाहिए। उन्हें केन्द्र शासित क्षेत्र बनाने का कोई लाभ नहीं है। मेरा डॉ. साहब से यही निवेदन है। वह एक महान विद्वान हैं और इस नाते उन्हें इस देश की भी प्रज्ञा की भूमि मानना चाहिए। उनसे मेरी अपील है कि वे इस संविधान में भारत की आत्मा को भी स्थान दें.....।
ज्ञानी गुरुमुख सिंह मुसाफिर (पूर्वी पंजाब-सिख)ः सभापति महोदय, अपने माननीय मित्र श्री देशबंधु गुप्त की भांति मैं यह नहीं कह सकता कि प्रारुपण समिति अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर किसी बधाई के अधिकारी नहीं हैं। अनेक विषयों पर वह अनेक कारणों से बधाई के अधिकारी हैं और इस प्रथम संविधान के निर्माण में समिति का श्रम निश्चय ही प्रशंसनीय है। उसके बावजूद यदि किसी को भी त्रुटि मिले, वह उसे बताए तो उनकी समझ के पैमाने के अनुसार.....।
ख्2, माननीय पूज्यपाद जे.जे.एम. निकोलस-राय (असग-साधारण)ः उपसभापति महोदय, डॉ. अम्बेडकर और प्रारुपण समिति के अन्य सदस्यों को उनके इस वृहद कार्य के लिए जो कि उन्होंने इस प्रारुप संविधान के निर्माण के लिए हाथ में लिया है, श्रद्धासुमन अर्पित करने में मेरा भागीदार बनना वस्तुतः बड़ा विशेषाधिकार है। वे सब हमारे सर्वोत्तम धन्यवाद के अधिकारी है....।
मैं प्रारुप समिति को विशेष रुप से धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उसने असम में पर्वतीय जिलों में स्वायत्त जिला परिषदें बनाने के लिए प्रारुप स्वीकार कर लिया है। छठी अनुसूची में इन्हें स्वायत्त जिले कहा गया हैं।
ख्3, श्री मोहम्मद इस्माइल साहिब (मद्रास-मुस्लिम)ः उपसभापति महोदय.... यह वास्तव में एक बहुत विलक्षण भाषण है जिसमें माननीय डॉ. अम्बेडकर ने सदन से प्रारुप संविधान पर विचार करने को संस्तुति की है। स्पष्टतया तर्क द्वारा अपना पक्ष मनवाने में, अपनी छाप छोड़ने में और तर्क में यह लाजवाब हैं। उन्हें हमारी ढेर सारी बधाईयां लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई उनके भाषण की हर बात से सहमत हो.....
ख्4, श्री अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर (मद्रास-साधारण)ः श्रीमन, प्रारुप संविधान के बारे में अपने विचार व्यक्त करने से पहले मैं भी माननीय डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा करना चाहता हूँ कि उन्होंने प्रारुप संविधान के सिद्धांत की व्याख्या बहुत स्पष्ट और योग्यतापूर्वक ढंग से की है हालांकि यह कहना मेरा दायित्व है कि मेरे माननीय मित्र
2 . सी.ए.डी. खंड, 8 नवंबर, 1948, पृष्ठ 327 ।
3 सी.ए.डी. खंड, 7, 8 नवंबर 1948, पृष्ठ 330 ।
4 वही, पृष्ठ 327 ।