80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
जब हम अपने पड़ोसी प्रांतों की सहानुभूति और सद्भावना खो चुके हैं ऐसे समय में एक नागरिकता निश्चय ही विश्वासवर्धक तत्व है। पश्चिमी बंगाल के सदस्य के नाते, विशेषरुप से यह सोचकर प्रसन्न हूँ कि इससे आगे जब यह संविधान पारित हो जाएगा, जब पूरे भारत में समान अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ एकल नागरिकता का यह खंड पारित हो जाएगा, तो हमारे पड़ोसी प्रांतों के द्वार हमारे लिए खुल जाएंगे जिससे हमारे पूर्वीय पाकिस्तान के अभागे बंधु हमारे पड़ोसी प्रांतों में सांस ले सकेंगे।
वी.आई. मुनीस्वामी पिल्लै (मद्रास-साधारण)ः उपसभापति महोदय, इस पवित्र सभा में या उसके बाहर प्रारुपण समिति के प्रयासों और सेवाओं का जिसने उस सदन के अनुमोदनार्थ प्रारुप संविधान पेश किया है अवमूल्यन नहीं कर सकता। भावी पीढ़ी अत्यंत गौरव महसूस करेगी कि वह प्रारुपण समिति आज विश्व में विद्यमान अनेक संविधानों को आत्मसात करने और उनमें से उन उपबंधों को ग्रहण करने में समर्थ रही है जो इस महान उपमहाद्वीप के उत्थान के लिए जरुरी है....।
इन विचारों के साथ मैं प्रारुपण समिति के अध्यक्ष और सदस्यों को इस संविधान सभा में प्रारुप संविधान पेश करने की उनकी महान सेवा के लिए बधाई देता हूँ और मैं सदन में रखे गए प्रस्ताव की स्वीकृति की संस्तुति करता हूँ।
श्रीमती दक्षायणी वेलयुधन (मद्रासः साधारण)ः उपसभापति महोदय, अब यह प्रारुप व्यापक चर्चा के लिए हमारे सामने है। अतः मैं इस बारे में अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति देने का अनुरोध करती हूँ। प्रारुपण समिति के योग्य और कुल वक्ता अध्यक्ष ने नये भारत राज्य की सामान्य स्थापना की परिधि के भीतर अपना कर्तव्य प्रशसनीय ढंग से पूरा किया है। मैं महसूस करती हूँ कि यदि वहश चाहते तो भी उन प्रमुख सिद्धांतों से परे नहीं जा सकते थे जिनके अंतर्गत सत्ता का अंतरण हुआ था। अतः मेरा विचार है कि उनकी जो भी आलोचना की गई है वह अप्रशंसनीय और अनपेक्षित है। यदि कोई दोषारोपण है-और मेरे विचार में दोषारोपण किया गया है तो भी वह उन सभी पर होना चाहिए जो यहां उपस्थित हैं और जो संविधान की रचना के प्रयोजन के लिए भेजे गए थे और जिन पर इस देश के मूक करोड़ों लोगों ने जिम्मेदारियां सौंपी थीं। उन्होंने स्वाधीनता के लिए बड़े कष्ट उठाये थे और जब उन्होंने हमें इस सभा में भेजा था तो उन्हें बड़ी आशाएं थीं। परंतु इसका यह अभिप्राय नहीं है कि प्रारुप के बारे में मुझे कुछ आलोचना नहीं करनी।
ख्1, श्री देशबंधु गुप्त (दिल्ली) सभापति महोदय, मुझे अफसोस है कि मैं प्रारुपण समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर को बधाई नहीं दे सकता हालांकि उन्हें सदन के विभिन्न सदस्यों से बधाइयां मिली हैं....
1 सी.ए.डी. खंड 7, 8 नवंबर, 1948, पृष्ठ 312-17 ।