प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 102

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अपने विलक्षण भाषण में प्रारुप संविधान के सिद्धांतों को अत्यंत विशद् और योग्यतापूर्व ढंग से व्यक्त किया है। मैं प्रारुप संविधान की बारीकियों में नहीं जाना चाहता बल्कि उसके एक या दो पहलुओं पर ही अपने विचार प्रकट करके शांत हो जाऊँगा। मेरे विचार में, प्रारुप संविधान की सबसे प्रमुख विशेषताएं है अत्यंत सुदृढ़ केन्द्र और अपेक्षाकृत कमजोर लेकिन समरूप इकाइयां। डॉ. अम्बेडकर ने राज्यों के प्रतिनिधियों से बड़ी उत्कट अपील की थी कि वे ऐसा दृष्टिकोण अपनाएं जिससे कि सभी देशी रियासतों और प्रांतों का एक राह चलना संभव हो सके और कालांतर में रियासत एवं प्रांत किसी अंतर के बिना परिसंघ की सदृश इकाइयां हो सकें....

ख्1, श्री एम अनन्तशयनम् अय्यगर (मद्रासः साधारण)ः श्रीमन, प्रारुपण समिति ने जो प्रारुप संविधान आपके सामने रखा है उसके बारे में मौलिक महत्व की आपत्तियां की गई हैं। मैं इस बात से सहमत हूँ कि इस संविधान में ऐसी कोई बात नहीं है जो हमारी प्राचीन संस्कृति और हमारी परम्पराओं को परिलक्षित करती हो। यह सच है कि भारत शासन अधिनियम, 1935 की मूल प्रकृति सहित पाश्चात्य के आधुनिक संविधानों में से कुछ का भी नहीं बल्कि पाश्चात्य देशों के कुछ पुराने संविधानों का जोड़-जाड़ कर बनाया गया है। यह सच है कि उनका संकलन करके उन्हें एक आकार में ढाला गया है। किन्तु इसके लिए डॉ. अम्बेडकर जिम्मेदार नहीं हैं, संविधान के इस स्वरुप के लिए हम स्वयं जिम्मेदार रहे हैं। हमने यह नहीं सोचा कि संविधान को हम एक नया स्वरुप प्रदान करें जो हमारी प्राचीन संस्कृति की स्मृति रेखाओं में रंग भर दे। डॉ. अम्बेडकर से कहीं अधिक हम सब इसके लिए दोषी हैं....

ख्2, श्री रोहिणी कुमार चौधरी (असम-साधारण)ः श्रीमन, मैं आपका हृदय से आभारी हूँ कि आपने मुझे इस अत्यंत महत्पूर्ण बहस में भाग लेने का मौका दिया लेकिन सबसे पहले मैं प्रारुपण समिति के सदस्यों को बधाई देना चाहूँगा। हमारे गरीब प्रांत असम के यौवनकाल के उल्लास में उनकी सेवाओं को स्नेह और कृतज्ञता के साथ आज भी याद किया जाता है...।

ख्3, श्री एल. कृष्ण स्वामी भारतीय (मद्रास-साधारण)ः उपसभापति महोदय.... डॉ. अम्बेडकर प्रारुप संविधान को विद्वानपूर्ण एवं प्रतिभाशाली ढंग से प्रकाश में लाने के लिए इस सदन की बधाई के पात्र है। वह प्रारुप में कुछ उपबंधों के लिए मात्र इसलिए बधाई के हकदार नहीं हैं कि वे उनके नहीं है। माननीय सदस्यों को ध्यान होगा कि प्रारुप संविधान में अधिकांश खंडों पर सदन में विचार-विमर्श, वाद-विवाद और विनिश्चय किया गया है। कुछेक विषय ही ऐसे थे जो प्रारुपण समिति द्वारा समावेश किए जाने

1 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 8 नवंबर, 1948, पृष्ठ 352। 2 वही, 354 ।

3 वही, पृष्ठ 365 ।